सिंचाई बंधु की बैठक में खुली विभागीय लापरवाही की परतें, कहीं पानी चोरी तो कहीं सरकारी जमीन पर कब्जे की शिकायत; वर्षों से शिकायतों के बावजूद कार्रवाई पर सवाल
बैठक में सुनवाई करते सिंचाई बंधु उपाध्यक्ष रावत
मथुरा, 15 सितंबर। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सरकार में माफिया के खिलाफ सख्त कार्रवाई के दावे किए जाते हैं, लेकिन मथुरा में सिंचाई विभाग से जुड़ी शिकायतें इन दावों के सामने बड़ा सवाल खड़ा कर रही हैं। कहीं नहर का पानी टेल तक नहीं पहुंच रहा है, कहीं सिंचाई विभाग की बेशकीमती जमीन पर कब्जे की शिकायत है तो कहीं नहर के बीच दीवार खड़ी कर पानी चोरी किए जाने का आरोप। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब शिकायतें वर्षों से अधिकारियों के सामने हैं तो कार्रवाई क्यों नहीं होती?
राजीव भवन स्थित सभागार में मंगलवार को जनपद सिंचाई बंधु की बैठक उपाध्यक्ष सुधीर रावत की अध्यक्षता में हुई। बैठक में करीब ढाई दर्जन शिकायतें सामने आईं। किसानों और जनप्रतिनिधियों ने सिंचाई व्यवस्था की बदहाली से लेकर सरकारी जमीनों पर कथित कब्जों तक के मुद्दे उठाए। शिकायतों की गंभीरता ने सिंचाई विभाग के कामकाज और अधिकारियों की जवाबदेही पर सवाल खड़े कर दिए।
ग्राम पंचायत अहमल में सिंचाई विभाग की जमीन भू-माफिया द्वारा राजस्व विभाग की कथित मिलीभगत से अपने नाम कराए जाने की शिकायत फौरन सिंह बोरपा ने रखी। सवाल यह है कि यदि जमीन सरकारी है तो वह निजी नाम कैसे पहुंची और वर्षों से शिकायत के बाद भी उसे वापस लेने की कार्रवाई क्यों नहीं हुई? अहमल माइनर के टेल पर दो समरसेबल बोर लगाए जाने की शिकायत भी सामने आई।
बलदेव क्षेत्र में अल्पकाओं और राजवाहों का पानी टेल तक नहीं पहुंचने का मुद्दा किसान नेता राजकुमार तोमर ने उठाया। छाता क्षेत्र के खिटाविटा और सांचोली के किसानों को नंदगांव राजवाह से पानी नहीं मिलने की शिकायत भी की गई। किसानों के लिए यह केवल सिंचाई विभाग की तकनीकी समस्या नहीं है। समय पर पानी न मिलने का सीधा असर फसल की लागत, उत्पादन और किसान की आर्थिक स्थिति पर पड़ता है।
जिला पंचायत सदस्य आरपी सिंह ने बठेन ड्रेन की सफाई नहीं होने से क्षेत्र में जलभराव की समस्या उठाई। विधायक पूरन प्रकाश ने मथुरा एस्केप पर अवैध अतिक्रमण का मुद्दा उठाया। शहरी क्षेत्र के लोहवन और वृंदावन माइनर के बड़े हिस्से पर कथित भू-माफियाओं के कब्जे की शिकायत ने भी विभागीय निगरानी पर सवाल खड़ा किया।
शेखसाही के समीप हरियाणा के गांव करमन के पास आगरा कैनाल में दीवार खड़ी कर कथित रूप से पानी चोरी किए जाने की शिकायत भी बैठक में सामने आई। यदि मुख्य नहर के बीच इस तरह का निर्माण हुआ है तो सवाल है कि सिंचाई विभाग के निरीक्षण तंत्र को इसकी जानकारी कब हुई और कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
जुल्हेंदी माइनर का मामला भी कम गंभीर नहीं है। बाकलपुर के पास पुलिया को अवैध बताकर सिंचाई विभाग द्वारा तोड़े जाने से सैकड़ों परिवारों का आवागमन प्रभावित होने की शिकायत की गई। इसी माइनर का पालिखेड़ा से भरतपुर रोड तक का हिस्सा भी अतिक्रमण की चपेट में बताया गया।
बैठक की सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि विभाग को अब पक्के अतिक्रमण चिन्हित कर नोटिस चस्पा करने की कार्रवाई तत्काल शुरू करने के निर्देश दिए गए हैं। रबी फसली सत्र के लिए सिल्ट सफाई की निविदा प्रक्रिया समय से शुरू करने और निर्धारित अवधि में काम पूरा करने को कहा गया। सिल्ट सफाई के दौरान अवैध कुलाबों और पाइप लाइनों के खिलाफ अभियान चलाने तथा क्षतिग्रस्त पुलियाओं की दीवारों को दुरुस्त करने के निर्देश भी दिए गए।
सिंचाई बंधु उपाध्यक्ष सुधीर रावत ने अधिकारियों की कार्यशैली पर सीधे सवाल उठाते हुए कहा कि किसानों की शिकायतों का समाधान नहीं होने से उनकी खेती और आर्थिक स्थिति प्रभावित हो रही है। उन्होंने इस बात पर भी सवाल उठाया कि जब जमीनों पर वर्षों से कब्जे की शिकायतें हैं तो उन्हें कब्जामुक्त कराने की प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं हो रही।
यहां सवाल केवल सिंचाई विभाग का नहीं, बल्कि शासन की निगरानी व्यवस्था का भी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ माफिया के खिलाफ कार्रवाई को अपनी सरकार की प्रमुख उपलब्धियों में गिनाते हैं। ऐसे में सरकारी जमीन पर कब्जे की शिकायत यदि वर्षों तक बनी रहती है तो स्थानीय स्तर पर जिम्मेदारी किसकी है? अवैध कब्जा करने वाला ताकतवर है या कार्रवाई करने वाला तंत्र कमजोर?
और सबसे बड़ा सवाल—यदि सिंचाई विभाग की जमीन पर कब्जा है तो जमीन खाली क्यों नहीं हो रही? विवादित संपत्ति की स्थिति स्पष्ट कर उसे सुरक्षित क्यों नहीं किया जाता? संबंधित लोगों के खिलाफ मुकदमा और वैधानिक कार्रवाई क्यों नहीं होती? सरकारी जमीन की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही क्यों तय नहीं होती?
बैठक में विद्युत विभाग के देहात क्षेत्र के सभी अधिशासी अभियंताओं की अनुपस्थिति ने भी सवाल खड़े किए। किसानों की समस्याओं से जुड़ी बैठक में सूचना के बावजूद अधिकारियों का नहीं पहुंचना इस बात का संकेत माना गया कि किसानों की शिकायतों को लेकर विभागीय गंभीरता कितनी है। इनके विरुद्ध प्रशासनिक कार्रवाई की संस्तुति की गई है।
हालांकि बलदेव क्षेत्र में बरसाती नालों पर किए गए गुणवत्तापरक कार्यों के लिए राजकुमार तोमर और देवेंद्र पहलवान ने सिंचाई विभाग के अधिकारियों की प्रशंसा भी की। यानी किसान काम का विरोध नहीं कर रहे, बल्कि काम नहीं होने और शिकायतों पर कार्रवाई न होने का विरोध कर रहे हैं।
अब निगाह शासन और सिंचाई विभाग की अगली कार्रवाई पर है। ढाई दर्जन शिकायतें बैठक की फाइल में दर्ज होकर फिर अगली बैठक तक न पहुंच जाएं, यही सबसे बड़ा सवाल है। क्योंकि किसान को आश्वासन नहीं, खेत तक पानी चाहिए। सरकारी जमीन को बचाने के लिए बयान नहीं, कब्जामुक्त कार्रवाई चाहिए।
किसानों का असली शत्रु कौन है—नहर का पानी रोकने वाला माफिया या उसकी शिकायत के बाद भी आंखें मूंद लेने वाला अफसरशाही तंत्र? इस सवाल का जवाब अब कार्रवाई से ही मिलेगा।