ब्रजभूमि एक बार फिर दिव्य चेतना से आलोकित होने को तैयार है। दो नवंबर को जब भगवान विष्णु योगनिद्रा का त्याग करेंगे, तब सब देवता ब्रज में भक्ति की ज्योति जलाएंगे। जब भगवान विष्णु शयन करते हैं, तब देवता ब्रजभूमि में ही निवास करते हैं। यही कारण है कि चातुर्मास का सबसे बड़ा महत्व ब्रज में ही माना जाता है।
पंडित श्यामानंद जी महाराज
वृंदावन के संत पंडित श्यामानंद जी महाराज ने कहा —देवउठनी एकादशी केवल जागरण नहीं, यह वह क्षण है जब पूरी सृष्टि में दिव्यता लौटती है। ब्रज में यह दिन भगवान श्रीकृष्ण की लीला भूमि के पुनः प्राण जागरण का प्रतीक है।
संत पंडित श्यामानंद जी महाराज
ब्रज में इस दिन लाखों श्रद्धालु मथुरा और वृंदावन के मध्य आयोजित तीन वन की परिक्रमा करेंगे। यह परिक्रमा वर्ष में केवल एक बार, इसी एकादशी को होती है। इसके साथ भक्तजन मधुवन, तालवन, कमोदवन और गहवरवन की भी परिक्रमा लगाते हैं। गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा में भी भक्तों का सैलाब उमड़ने की संभावना है।
वृंदावन के संत पंडित श्यामानंद जी महाराज
पंडित श्यामानंद जी महाराज ने बताया कि इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विशेष पूजा की जाती है। इसी अवसर पर तुलसी और शालिग्राम का विवाह होता है, जो भक्ति और वैवाहिक जीवन की पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। इस दिन से विवाह, गृह प्रवेश और अन्य शुभ कार्यों के मुहूर्त भी आरंभ हो जाते हैं। चैतन्य महाप्रभु जी की परंपरा के अनुसार, इस पर्व को उदया तिथि पर मनाते हैं।
ब्रज की गलियों में भक्तों के जयकारों से वातावरण गूंज उठता है
—जागे विष्णु, जागे देव, जागी ब्रज की भक्ति;
श्रीकृष्ण की लीला भूमि में फिर गूंजी दिव्य शक्ति।
पंडित श्यामानंद जी महाराज ने कहा जब देवता ब्रजभूमि में रहते हैं और फिर जागते हैं । यही ब्रज की शक्ति है।