दिलीप यादव, वरिष्ठ पत्रकार। मथुरा
ब्रज के कलाकारों को उन्हीं के लिए बने मंच पर नहीं मिलती मुख्य प्रस्तुति
-ब्रज के नाम पर बाहरी कलाकारों पर करोड़ों रुपए किए जा रहे खर्च 
। ब्रज रज उत्सव । इतने सुन्दर वाक्य के श्रजन में अनेक पुरोधा लगे लेकिन पहले ब्रज रज उत्सव में भी कैलाश खैर जैसे नामचीन गायकों को तवज्जो मिली। ब्रज कला और कलाकार पिछले पायदान पर ही रहे। हालिया आयोजित ब्रज रज उत्सव के शुभारंभ अवसर पर ब्रज संस्कृति के संवाहकों में से किसी को बुलाना तक उचित नहीं समझा। उत्सव ब्रज की कला और कलाकारों से ज्यादा फिल्म जगत के कलाकारों को ही फेम दे रहा है। इसे लेकर लोगों में नाराजगी है।
मंगलवार को इस आशय की एक बैठक पद्मश्री मोहन स्वरूप भाटिया के आवास पर हुई। इसमें वक्ताओं ने
बृज के कलाकारों को फेम न देने पर आक्रोश व्यक्त किया। समाजसेवी प्रहलाद यादव ने कहा कि कलाकारों को संगठित होकर एक होना होगा। समूचा विश्व ब्रज संस्कृति का दिवाना है। ठेठ ब्रज संस्कृति आधारित आयोजन भी अपार भीड़ जुटा सकता हैं लेकिन इसमें खर्चा कम होगा। इससे लोगों के निजी हित प्रभावित होंगे। डा. सीमा मोरवाल ने भी बृज की कलाकारों के कार्यक्रम दिनमें कराने तथा बाहरी एवं गैर ब्रज संस्कृति आधारित कार्यक्रमों की मुख्य प्रस्तुतियां कराने पर नाराजगी व्यक्त की। जिला गंगा समिति सदस्य दिलीप कुमार यादव ने कहा कि ब्रज के जन प्रतिनिधियों को ही ब्रज संस्कृति की चिंता नहीं है। पहले ब्रजरज उत्सव से ही फिल्मी कलाकारों को बुलाने की परंपरा चली आ रही है और उन्हीं को हाईलाइट किया जाता है। किसी ने इसका मुखर विरोध नहीं किया। नाट्यविद लोकेंद्र नाथ कौशिक जैसे कलाकारों ने दो 5 दिन तक भूख हड़ताल भी की लेकिन कोई कलाकार साथ नहीं आया। ब्रज संस्कृति की दुहाई देकर लाखों करोड़ों कमाने वाले लोग ठेठ ब्रज संस्कृति आधारित कार्यक्रम कराकर आदर्श प्रस्तुत करें। रासाचार्य अशोक स्वामी ने कहा कि इस सब के लिए कलाकार भी जिम्मेदार हैं। उनका न कोई संगठन है न एकता है। डा. राजेन्द्र कृष्ण अग्रवाल,
दामोदर शर्मा, डोरीलाल गोला, जगदीश ब्रजवासी, अरुण,पूजा आदि कलाकारों ने कहा कि अधिकारियों को चिंतन करना होगा। अन्य जनपदों में भी क्षेत्रीय आयोजन होते हैं। वहां किसी बाहरी कलाकार को मौका नहीं दिया जाता। ब्रज रज उत्सव में भी केवल ब्रज संस्कृति का प्रदर्शन होना चाहिए । ब्रज संस्कृति समूचे विश्व के आकर्षण का केन्द्र है। उसे कमतर न आंका जाए न प्रदर्शित होने दिया जाए। सोस्यल मीडिया पर भी विरोध के स्वर मुखरित होने लगे हैं।








