मनोज चौधरी मथुरा
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भारतीय लोकतंत्र में ऐसे जननेता बहुत कम हुए हैं, जिनकी ताकत किसी राजनीतिक पद, सरकारी शक्ति या चुनावी समीकरणों से नहीं, बल्कि सीधे जनता के भरोसे से बनी हो। महात्मा चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत उन्हीं विरले नेताओं में शामिल थे। वे सत्ता के गलियारों के आदमी नहीं थे, लेकिन उनकी एक हुंकार दिल्ली सरकार तक सुनाई देती थी। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांवों से उठी उनकी आवाज़ कई बार राजधानी की नीतियों और प्रशासनिक फैसलों पर भारी पड़ती दिखाई दी।
आज उनकी पुण्यतिथि पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में किसान संगठनों और ग्रामीण समाज ने उन्हें याद किया। श्रद्धांजलि सभाओं में केवल भावनाएं नहीं थीं, बल्कि उस दौर की स्मृतियां भी थीं जब किसान पंचायतें सत्ता के लिए गंभीर राजनीतिक संकेत मानी जाती थीं।
सिसौली गांव से निकलकर राष्ट्रीय किसान राजनीति का बड़ा चेहरा बनने वाले बाबा टिकैत ने भारतीय किसान यूनियन को केवल संगठन नहीं, बल्कि किसान स्वाभिमान का आंदोलन बनाया। उनकी राजनीति का केंद्र गांव, खेत और किसान था। यही कारण था कि किसान उन्हें अपना प्रतिनिधि नहीं, बल्कि अपना आदमी मानते थे।
1980 और 1990 का दशक भारतीय किसान आंदोलनों का महत्वपूर्ण दौर माना जाता है। उस समय गन्ना मूल्य, बिजली दरें, सिंचाई और कर्ज जैसे मुद्दों पर किसानों में गहरा असंतोष था। बाबा टिकैत ने इस असंतोष को दिशा दी। दिल्ली का ऐतिहासिक बोट क्लब आंदोलन इसका सबसे बड़ा उदाहरण बना, जब लाखों किसान राजधानी पहुंचे और सरकार को किसानों की मांगों पर झुकना पड़ा। उस आंदोलन ने यह संदेश दिया कि खेतों की ताकत यदि संगठित हो जाए तो दिल्ली की राजनीति को भी अपनी दिशा बदलनी पड़ सकती है।
बाबा टिकैत की सबसे बड़ी विशेषता उनका सीधा और निडर स्वभाव था। वे राजनीतिक भाषा में नहीं, गांव की चौपाल की भाषा में बात करते थे। उनके शब्दों में बनावट नहीं होती थी, लेकिन असर इतना गहरा होता था कि प्रशासन और सरकार दोनों सतर्क हो जाते थे। यही कारण था कि उनकी पंचायतें केवल सामाजिक आयोजन नहीं, बल्कि सत्ता के लिए चेतावनी मानी जाती थीं।
उनके दौर की कई घटनाएं आज भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चर्चा का विषय हैं। किसान मानते थे कि बाबा टिकैत के रहते प्रशासन ग्रामीण समाज की अनदेखी करने से बचता था। उनकी ताकत केवल भीड़ जुटाने में नहीं थी, बल्कि उस भरोसे में थी जो किसानों ने उनके नेतृत्व पर किया।
आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं। किसान आंदोलन अब कई हिस्सों में बंटे दिखाई देते हैं। राजनीति का प्रभाव भी किसान संगठनों पर बढ़ा है। ऐसे समय में बाबा टिकैत की याद इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि उन्होंने किसान राजनीति को आत्मसम्मान और एकजुटता का आधार दिया था। वे जानते थे कि बिखरा किसान केवल शिकायत कर सकता है, लेकिन संगठित किसान सत्ता से जवाब मांग सकता है।
उनकी पुण्यतिथि पर “भारत रत्न” देने की मांग भी उठी। यह मांग केवल सम्मान की राजनीति नहीं, बल्कि उस योगदान की स्वीकार्यता का आग्रह है, जिसने देश में किसान आंदोलनों को नई पहचान दी।
आज जब खेती बढ़ती लागत, मौसम परिवर्तन और बाजार के दबाव जैसी चुनौतियों से जूझ रही है, तब बाबा टिकैत की विरासत और अधिक प्रासंगिक दिखाई देती है। उनकी सबसे बड़ी सीख यही थी कि किसान की ताकत उसकी एकता में है। खेतों की मेड़ों से निकली आवाज़ यदि संगठित हो जाए, तो दिल्ली की सरकारें भी उसे अनसुना नहीं कर सकतीं।








