धार/इंदौर। भोजशाला विवाद पर वर्षों से चल रहे कानूनी विवाद में इंदौर हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए भोजशाला को देवी वाग्देवी सरस्वती से जुड़ा मंदिर और संस्कृत शिक्षण केंद्र माना है। अदालत ने अपने निर्णय में स्पष्ट कहा कि इस परिसर में हिंदू पूजा-अर्चना की परंपरा कभी समाप्त नहीं हुई और ऐतिहासिक व पुरातात्विक साक्ष्य इसके मूल स्वरूप की पुष्टि करते हैं।
हाईकोर्ट ने हिंदू पक्ष की दलीलों को स्वीकार करते हुए मुस्लिम पक्ष की आपत्तियों को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेज, पुरातात्विक अध्ययन और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट यह दर्शाती है कि यह स्थल प्राचीन काल में संस्कृत शिक्षा और देवी वाग्देवी की आराधना का प्रमुख केंद्र था।
ASI की रिपोर्ट को अदालत ने माना विश्वसनीय
पुरातात्विक साक्ष्यों और ऐतिहासिक रिकॉर्ड का दिया हवाला
फैसले में अदालत ने कहा कि एएसआई द्वारा किए गए वैज्ञानिक सर्वेक्षण और संरचनात्मक अध्ययन को सुरक्षित रूप से आधार माना जा सकता है। कोर्ट ने माना कि भोजशाला का संबंध परमार वंश के राजा भोज से रहा है और यह स्थान ऐतिहासिक रूप से ज्ञान, शिक्षा और हिंदू उपासना का केंद्र था।
अदालत ने अपने निष्कर्ष में यह भी दर्ज किया कि 18 मार्च 1904 से यह परिसर संरक्षित स्मारक के रूप में अधिसूचित है। न्यायालय ने कहा कि संरक्षित स्मारक होने के कारण इसके ऐतिहासिक और धार्मिक स्वरूप की अनदेखी नहीं की जा सकती।
अयोध्या फैसले की कानूनी मिसाल का भी उल्लेख
हाईकोर्ट बोला— पुरातात्विक साक्ष्य न्यायिक प्रक्रिया में स्वीकार्य
श्री कृष्ण जन्मभूमि का भी चल रहा है हाईकोर्ट में मुकदमा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने क्या कहा इस विवाद को लेकर, जाने?
सुनवाई के दौरान अदालत ने अयोध्या राम जन्मभूमि फैसला से जुड़ी कानूनी मिसालों का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि धार्मिक और ऐतिहासिक विवादों में पुरातात्विक एवं वैज्ञानिक साक्ष्यों की अहम भूमिका होती है और उन्हें न्यायिक प्रक्रिया में स्वीकार किया जा सकता है।
इसी आधार पर अदालत ने भोजशाला परिसर में हिंदुओं के पूजा अधिकार को मान्यता दी।
सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने रखे तर्क
हिंदू पक्ष ने कहा— प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट लागू नहीं
हिंदू पक्ष के अधिवक्ताओं ने अदालत में दलील दी कि भोजशाला एएसआई संरक्षित स्मारक है, इसलिए उस पर “प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट” लागू नहीं होता। उन्होंने राजा भोज के ग्रंथ “समरांगण सूत्रधार” का हवाला देते हुए कहा कि परिसर की वास्तुकला प्राचीन मंदिर निर्माण शैली के अनुरूप है।
वहीं मुस्लिम पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने एएसआई सर्वेक्षण की गुणवत्ता पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि यह स्थल लंबे समय से कमाल मौला मस्जिद के रूप में भी उपयोग में रहा है। मुस्लिम पक्ष ने अदालत से एएसआई रिपोर्ट को अंतिम आधार न मानने की अपील की थी।
सुनवाई के दौरान जैन समाज ने भी हस्तक्षेप करते हुए दावा किया कि परिसर में मिली प्रतिमा मां अंबिका की है, जिसे जैन तीर्थ घोषित किया जाना चाहिए। हालांकि अदालत ने इन दावों को स्वीकार नहीं किया।
केंद्र सरकार और ASI को दिए निर्देश
प्रबंधन और संरक्षण की व्यवस्था जारी रखने को कहा
हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार और एएसआई को निर्देश दिया है कि भोजशाला परिसर के प्रशासन, संरक्षण और संस्कृत शिक्षण से जुड़े प्रबंधन के लिए आवश्यक निर्णय लिए जाएं। अदालत ने कहा कि एएसआई पूर्व की भांति इस संरक्षित परिसर का प्रशासन जारी रखेगा।
कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि मुस्लिम पक्ष चाहे तो वह सरकार से अलग भूमि की मांग कर सकता है, जिससे विवाद का संतुलित समाधान निकल सके।
फैसले के बाद धार में सुरक्षा कड़ी
मुस्लिम पक्ष करेगा सुप्रीम कोर्ट में अपील
फैसले के बाद धार जिले और भोजशाला परिसर के आसपास सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी गई है। प्रशासन ने संवेदनशील क्षेत्रों में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया है।
मुस्लिम पक्ष ने फैसले पर असहमति जताते हुए कहा है कि वे आदेश का विस्तृत अध्ययन कर सुप्रीम कोर्ट में अपील करेंगे। शहर काजी ने कहा कि वे हाईकोर्ट का सम्मान करते हैं, लेकिन फैसले के कई तकनीकी पहलुओं पर पुनर्विचार आवश्यक है।
दशकों पुराने विवाद को मिली नई कानूनी दिशा
भोजशाला मामले पर आया यह फैसला देशभर में चर्चा का विषय बन गया है। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार अदालत ने अपने निर्णय में ऐतिहासिक तथ्यों, वैज्ञानिक सर्वेक्षण और पूजा की निरंतरता को महत्वपूर्ण आधार बनाया है। माना जा रहा है कि यह फैसला भविष्य में धार्मिक और ऐतिहासिक विवादों से जुड़े मामलों में भी एक अहम संदर्भ बन सकता है।








