वृंदावन के ‘पंचायत दंगल’ में श्रीकृष्ण जन्मभूमि प्रकरण के हिंदू पक्षकार महेंद्र प्रताप सिंह एडवोकेट ने रखा पक्ष, वक्फ बोर्ड से जुड़े वारिस पठान के साथ बहस ने खींचा ध्यान
मथुरा/वृंदावन। अयोध्या में राम मंदिर और काशी विश्वनाथ धाम के बाद अब उत्तर प्रदेश की मंदिर राजनीति में मथुरा का नाम तेजी से चर्चा में है। श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह प्रकरण अदालत में विचाराधीन है, लेकिन इसके साथ ही यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक विमर्श में भी लगातार जगह बना रहा है।
जाने क्या हुआ था उस दिन मंच पर ?
इसी बीच हाल ही में वृंदावन में आयोजित एक चर्चित ‘पंचायत दंगल’ के मंच पर श्रीकृष्ण जन्मभूमि प्रकरण के हिंदू पक्षकार महेंद्र प्रताप सिंह एडवोकेट और मुस्लिम पक्ष की ओर से कार्यक्रम में मौजूद वारिस पठान के बीच हुई तीखी बहस ने इस पूरे विवाद को फिर सुर्खियों में ला दिया।
महेंद्र प्रताप सिंह ने उठाया मंदिर का सवाल
कार्यक्रम में जब श्रीकृष्ण जन्मभूमि परिसर से जुड़े विवाद और शाही ईदगाह को लेकर चर्चा हुई तो महेंद्र प्रताप सिंह एडवोकेट ने हिंदू पक्ष का तर्क मजबूती से रखा।

उन्होंने सवाल को केवल राजनीतिक बहस तक सीमित रखने के बजाय इसे श्रीकृष्ण जन्मभूमि के अधिकार और न्यायिक प्रक्रिया से जोड़कर प्रस्तुत किया।

मंच पर जब मस्जिद को हटाए जाने की संभावना का विरोध किया गया तो दोनों पक्षों के बीच बहस तेज हो गई। महेंद्र प्रताप सिंह ने अपने तर्कों के जरिए हिंदू पक्ष के दावे को सामने रखा।
बहस के बीच गूंजा—‘सुप्रीम कोर्ट फैसला करेगा’
पंचायत दंगल के मंच पर बहस के दौरान वारिस पठान की ओर से बार-बार ‘सुप्रीम कोर्ट फैसला करेगा’ की बात कही गई।
यही बात इस बहस का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई।
एक ओर महेंद्र प्रताप सिंह एडवोकेट अपने पक्ष के तर्क और दावों को सामने रख रहे थे, वहीं दूसरी ओर बहस का अंतिम निर्णय न्यायालय पर छोड़ने की बात कही जा रही थी।
मंच पर मौजूद दर्शकों और युवाओं की प्रतिक्रिया ने भी इस बहस को खास बना दिया।
जेन-जी ने बजाईं तालियां, महेंद्र प्रताप के समर्थन में दिखा उत्साह
बहस के दौरान जब महेंद्र प्रताप सिंह एडवोकेट ने हिंदू पक्ष की ओर से अपनी बात मजबूती से रखी तो कार्यक्रम में मौजूद जेन-जी युवाओं ने तालियां बजाकर उनका समर्थन किया।
यह दृश्य इसलिए महत्वपूर्ण रहा क्योंकि मथुरा का श्रीकृष्ण जन्मभूमि विवाद अब केवल पुरानी पीढ़ी की बहस तक सीमित नहीं दिखाई दे रहा। युवा वर्ग भी इस प्रकरण को लेकर अपनी रुचि और प्रतिक्रिया सार्वजनिक रूप से व्यक्त करता नजर आ रहा है।

महेंद्र प्रताप सिंह के लिए यह समर्थन महज तालियों तक सीमित नहीं था। इसे इस बात के संकेत के तौर पर भी देखा गया कि नई पीढ़ी इस कानूनी और धार्मिक विवाद को समझने तथा उसके भविष्य को लेकर सवाल करने में दिलचस्पी ले रही है।
‘सुप्रीम कोर्ट’ की बात ने बहस को दिया नया मोड़
पंचायत दंगल में हुई बहस का एक दिलचस्प पहलू यह भी रहा कि जब तर्क-वितर्क तेज हुआ तो मामला अंततः अदालत के फैसले तक पहुंच गया।
वारिस पठान का यह कहना कि सुप्रीम कोर्ट ही फैसला करेगा, अपने आप में यह स्वीकार करता है कि अंतिम निर्णय न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से ही सामने आएगा।

यहीं से हिंदू पक्ष के लिए बहस का दूसरा पहलू सामने आया—यदि फैसला अदालत को ही करना है तो फिर हिंदू पक्ष अपने दावों को न्यायालय के सामने मजबूती से क्यों न रखे?
महेंद्र प्रताप सिंह एडवोकेट इसी न्यायिक लड़ाई को आगे बढ़ाने वाले प्रमुख हिंदू पक्षकारों में शामिल हैं।
महेंद्र प्रताप सिंह बने मथुरा के मुद्दे का प्रमुख चेहरा
श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह प्रकरण में महेंद्र प्रताप सिंह एडवोकेट लगातार हिंदू पक्ष की आवाज को सार्वजनिक मंचों पर उठाते रहे हैं।

उनकी भूमिका केवल अदालत तक सीमित नहीं है। वे विभिन्न मंचों पर श्रीकृष्ण जन्मभूमि से जुड़े हिंदू पक्ष के दावों और कानूनी तर्कों को जनता के सामने रखते रहे हैं।
यही कारण है कि वृंदावन के पंचायत दंगल में उनकी बहस को मथुरा की राजनीति और श्रीकृष्ण जन्मभूमि विवाद के व्यापक संदर्भ में देखा जा रहा है।
क्या 2027 में मथुरा बनेगा बड़ा मुद्दा?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। अयोध्या और काशी के बाद मथुरा को लेकर राजनीतिक चर्चा का बढ़ना इसी पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण है।
हालांकि श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह प्रकरण न्यायालय में लंबित है और इसका फैसला अदालत की प्रक्रिया से ही होगा, लेकिन राजनीतिक रूप से मथुरा का महत्व लगातार बढ़ रहा है।
एक तरफ अदालत में कानूनी लड़ाई है, दूसरी तरफ धार्मिक और सामाजिक स्तर पर बहस जारी है।
और इन दोनों के बीच महेंद्र प्रताप सिंह एडवोकेट जैसे हिंदू पक्षकार इस मुद्दे को लगातार सार्वजनिक विमर्श में बनाए हुए हैं।
मथुरा की राजनीति में अगला अध्याय?
अयोध्या ने उत्तर प्रदेश की राजनीति को दशकों तक प्रभावित किया। काशी ने धार्मिक आस्था के साथ विकास और सांस्कृतिक पहचान का नया मॉडल पेश किया।
अब सवाल मथुरा का है।
क्या श्रीकृष्ण जन्मभूमि का मुद्दा 2027 से पहले उत्तर प्रदेश की मंदिर राजनीति का अगला बड़ा अध्याय बनेगा?
वृंदावन के पंचायत दंगल में हुई बहस ने कम से कम इतना जरूर स्पष्ट कर दिया है कि यह मामला केवल अदालत की फाइलों में बंद नहीं है। इसके पक्ष-विपक्ष में सार्वजनिक बहस जारी है और नई पीढ़ी भी इसे सुन रही है, सवाल कर रही है और अपनी प्रतिक्रिया दे रही है।
महेंद्र प्रताप सिंह एडवोकेट की मंच पर रखी गई दलीलों और उसके बाद युवाओं की प्रतिक्रिया ने इस बहस को नया राजनीतिक और सामाजिक संदर्भ दे दिया है।
अब निगाह अदालत पर

मंच पर चाहे कितनी भी बहस हो, श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह प्रकरण का कानूनी भविष्य न्यायालय के फैसले से ही तय होगा।
यही वजह है कि अब सवाल केवल यह नहीं है कि मथुरा की राजनीति किस दिशा में जाएगी, बल्कि यह भी है कि अदालत में चल रही कानूनी लड़ाई किस मुकाम तक पहुंचती है।
अयोध्या और काशी के बाद मथुरा—क्या अब उत्तर प्रदेश की मंदिर राजनीति का अगला केंद्र बनने जा रहा है?
इस सवाल के केंद्र में फिलहाल श्रीकृष्ण जन्मभूमि का मुद्दा और हिंदू पक्षकार महेंद्र प्रताप सिंह एडवोकेट की कानूनी लड़ाई दोनों दिखाई दे रहे हैं।





