अड़ींग में ‘बर्ड रिवाइवल मॉडल’ की सफलता, अब हर गली में उड़ रही गौरैया

 

दिलीप यादव वरिष्ठ पत्रकार मथुरा 

 

कंचनपुर के 20 घोंसलों से शुरू हुआ प्रयोग बना मिसाल, 100 घोंसले भरते ही आसपास गांवों तक फैला कुनबा

मथुरा (विशेष रिपोर्ट):

अड़ींग और उसके आसपास का इलाका इन दिनों एक अनोखे “बर्ड रिवाइवल मॉडल” की वजह से चर्चा में है। जहां कभी गौरैया का दिखना दुर्लभ हो गया था, वहीं अब हर सुबह उनकी चहचहाहट लोगों की दिनचर्या तय कर रही है।

करीब 5-7 साल पहले गोवर्धन रेंज के एक वन अधिकारी द्वारा शुरू किया गया छोटा-सा प्रयोग आज बड़े बदलाव की कहानी बन चुका है। कंचनपुर स्थित महर्षि दयानंद ग्रामोत्थान संस्था परिसर में सबसे पहले 20 लकड़ी के घोंसले लगाए गए। शुरुआत में यह प्रयास साधारण लगा, लेकिन धीरे-धीरे यह पूरे क्षेत्र के लिए उम्मीद की किरण बन गया।

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जिला गंगा समिति सदस्य दिलीप कुमार यादव बताते हैं कि शुरुआती दिनों में घोंसलों के बड़े द्वार के कारण कौओं ने गौरैया के बच्चों को नुकसान पहुंचाया। लेकिन तीरंदाजी कोच योगेन्द्र राणा ने घोंसलों के डिजाइन में बदलाव कर द्वार छोटे कर दिए। यही बदलाव इस प्रयोग का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।

इसके बाद गौरैया ने तेजी से इन घोंसलों को अपनाया और देखते ही देखते संख्या बढ़ने लगी। जब घोंसलों की संख्या 100 तक पहुंची और सभी भर गए, तो गौरैया ने आसपास के गांवों की ओर भी रुख कर लिया। आज अड़ींग से लेकर 2-3 किलोमीटर के दायरे में हर गली और आंगन में गौरैया दिखाई देती है।

दिलचस्प बात यह है कि जिन लोगों ने शुरुआत में इस पहल को गंभीरता से नहीं लिया, वे भी अब इसकी सफलता देखकर हैरान हैं। घोंसले बनाने वाले गजेन्द्र अग्रवाल बताते हैं कि शुरुआत में लोग मुफ्त में भी घोंसले लेने को तैयार नहीं थे, लेकिन एक स्थान पर किए गए प्रयोग ने पूरे क्षेत्र का पारिस्थितिकी संतुलन बदल दिया।

आज हालात यह हैं कि गौरैया की चहचहाहट अलार्म का काम कर रही है। भले ही कुछ लोगों की नींद पूरी न हो, लेकिन पर्यावरण प्रेमियों के लिए यह आवाज एक बड़ी सफलता का संकेत है।

 

अड़ींग का यह मॉडल साबित करता है कि छोटे-छोटे स्थानीय प्रयास भी बड़े पर्यावरणीय बदलाव ला सकते हैं—बस जरूरत है सही सोच, धैर्य और निरंतरता की।