मथुरा की मिट्टी फिर पुकार रही है “अब लौट भी आओ श्रीकृष्ण”

मनोज चौधरी । मथुरा 

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सुबह की आरती के बाद जब यमुना तट पर घंटों की ध्वनि गूंजती है, तो मथुरा का हर कण एक सवाल पूछता है।

क्या भगवान श्रीकृष्ण अपने ही मूल जन्मस्थान पर आज भी मस्जिद में रहेंगे?

संतों के एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति न्यास के अध्यक्ष महेंद्र प्रताप सिंह एडवोकेट

वृंदावन और मथुरा के बीच की वही पावन भूमि, जहां कभी नंदनंदन की किलकारी गूंजी थी, आज भी एक अधूरी प्रतीक्षा में है।

यहां की हवाएं उस इतिहास को जानती हैं, जब पांच हजार वर्ष पहले राजा वज्रनाभ ने श्रीकृष्ण के प्राकट्य स्थल पर पहला मंदिर बनवाया था।पर मुगल कल ने इस मंदिर की दीवारों को लहूलुहान किया — महमूद गजनवी से औरंगजेब तक, चार बार मंदिर गिराया गया, चार बार ब्रजवासियों ने उसे फिर खड़ा किया।

मगर 1670 में औरंगजेब ने जो इमारत उस पवित्र भूमि पर खड़ा कराई, वही आज शाही ईदगाह मस्जिद के नाम से खड़ी है — और श्रीकृष्ण जन्मभूमि अब भी मौन है।

मगर इस मौन को अब शब्द दे रहे हैं महेंद्र प्रताप सिंह एडवोकेट — जो पिछले पांच वर्षों से इस भूमि के न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं।

उन्होंने 2020 में अदालत की शरण ली, यह मांग करते हुए कि जन्मभूमि की ढाई एकड़ भूमि को हिंदू समाज को लौटाया जाए, ताकि श्रीकृष्ण मंदिर पुनः अपने प्राकट्य स्थल पर बन सके। उनकी कानूनी लड़ाई अब जनांदोलन बन चुकी है।