डगर चलि गोवर्धन की, जहां एकही होंगे भगवान, भक्त और प्रकृति

संत पंडित श्यामानंद जी महाराज, वृंदावन

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संत पंडित श्यामानंद जी महाराज

ब्रजभूमि की पावन धरा पर पर्वत भी देवता स्वरूप हैं। यहाँ त्रिदेव पर्वतों के रूप में विराजमान हैं — गोवर्धन में श्रीगिरिराज, जो स्वयं श्रीविष्णु के अवतार हैं; नंदगांव का नंदीश्वर पर्वत, जो भगवान शिव हैं; और बरसाना का ब्रह्मांचल पर्वत, जो ब्रह्मा जी का स्वरूप है। इन तीनों के साथ अष्टकूट, कनकाचल, सखी पर्वत आदि भी ब्रज में दिव्य देवस्वरूप माने जाते हैं।

गोवर्धन पर्वत श्रीराधा-माधव की रासस्थली और दिव्य लीला का केंद्र है। ब्रजवासी आज भी श्रद्धा से कहते हैं —

डगर चलि गोवर्धन की बाट, खेलत तहां मिलेंगे मोहन जहाँ गोधन कौ ठाट।

जब भगवान श्रीकृष्ण पृथ्वी का भार उतारने के लिए अवतरित हुए, तब उन्होंने राधा रानी से कहा —

“हे राधे! जब मैं पृथ्वी पर जन्म लूँगा, तब तुम मेरे वियोग में कैसे रहोगी?”

तब राधा जी ने उत्तर दिया —

“जहाँ वृंदावन सौ वन न हौवे, न हौ नदी यमुना सी, गोवर्धन सौ पर्वत न हौवे। वहां कैसे हौवे वास, मन भी रहे उदास।। 

राधा की इस वाणी को सुनकर श्रीकृष्ण ने तीनों — वृंदावन, यमुना और गोवर्धन — को भी ब्रज में अवतरित किया।

पुराणों में वर्णन है कि द्रोणाचल के पुत्र गोवर्धन जब अपने पुष्पों और लताओं से आच्छादित थे, तब पुलस्त्य ऋषि उन्हें अपने साथ ले गए। किंतु जब वे ब्रजभूमि से गुज़रे, तो गोवर्धन को अपने राधा-कृष्ण की भविष्य की लीलाओं का स्मरण हो आया। उन्होंने वहीं अपना भार बढ़ा लिया, जिससे ऋषि उन्हें आगे नहीं ले जा सके। क्रोधित ऋषि ने श्राप दिया कि गोवर्धन तिल-तिल घटता जाएगा।

रामायण काल में जब श्रीराम सेतु का निर्माण कर रहे थे, तब हनुमान जी गोवर्धन को लंका ले जाने लगे, किंतु आकाशवाणी से कार्य पूर्ण होने का संकेत मिला और गिरिराज जी को वहीं छोड़ दिया गया। व्यथित गोवर्धन को तब हनुमान जी ने आश्वस्त किया कि द्वापर युग में स्वयं श्रीकृष्ण आपके पूजन का विधान करेंगे। वही दिवस आज गोवर्धन पूजा के रूप में मनाया जाता है।

आज ब्रजमंडल में और देशभर में गिरिराज पूजन का पर्व है। घर-घर गोबर से गोवर्धन जी का स्वरूप बनाया जा रहा है। पंचामृत से अभिषेक और अन्नकूट का भोग लगेगा। भक्तजन आतिशबाजी और परिक्रमा के माध्यम से गिरिराज जी के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करेंगे।

गोवर्धन पूजा केवल पर्व नहीं, यह उस दिव्य संबंध का प्रतीक है जहाँ प्रकृति, भगवान और भक्त — तीनों एक हो जाते हैं।

ब्रज में आज भी गूंजता है — “जय जय श्रीगिरिराज महाराज की जय!”