आज पूरे देश में नरक चतुर्दशी, जिसे नरक चौदस या छोटी दिवाली के नाम से भी जाना जाता है, श्रद्धा और आस्था के साथ मनाई जा रही है। यह पर्व उस दिव्य क्षण की स्मृति है जब भगवान श्रीकृष्ण ने अत्याचारी असुर नरकासुर का वध कर संसार को उसके आतंक से मुक्त कराया था।
संत पंडित श्यामानंद जी महाराज
नरकासुर का आतंक और श्रीकृष्ण की लीला
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, प्रागज्योतिषपुर (वर्तमान असम) का राजा नरकासुर अत्यंत शक्तिशाली किंतु अहंकारी असुर था। उसने देवताओं, ऋषियों और पृथ्वीवासियों पर भयंकर अत्याचार किए और स्वर्ग की अनेक अप्सराओं व 16,000 कन्याओं को कैद कर लिया था।
जब अत्याचार असहनीय हो गया, तब भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लेकर देवी सत्यभामा के साथ उसका वध किया और सबको मुक्त कराया।
मरते समय नरकासुर ने वर मांगा कि उसकी मृत्यु के दिन लोग दीप प्रज्वलित करें, स्नान करें और आनंद मनाएं — तभी से नरक चतुर्दशी का पर्व आरंभ हुआ।
पर्व की परंपरा और मान्यता
हिंदू पंचांग के अनुसार यह दिन कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को मनाया जाता है। इस दिन प्रातःकाल तेल अभ्यंग स्नान, दीपदान और घरों की शुद्धि का विशेष महत्व है।
लोग मानते हैं कि इस दिन स्नान और दीपदान से पापों का नाश होता है और शुभता का आगमन होता है।
वृंदावन के प्रसिद्ध संत पंडित श्यामानंद जी महाराज के अनुसार —
“नरक चतुर्दशी केवल बाहरी सफाई का पर्व नहीं, यह आत्मा की शुद्धि का दिन है। जिस प्रकार श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वध किया, उसी प्रकार हमें अपने भीतर बसे अहंकार, क्रोध और लोभ का नाश करना चाहिए। यही सच्ची दिव्यता है।”
अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक
यह दिन यह संदेश देता है कि अंधकार चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, एक दीपक की लौ उसे मिटा सकती है।
अहंकार पर विनम्रता, अन्याय पर धर्म और अज्ञान पर ज्ञान की विजय — यही नरक चतुर्दशी का सार है।
मानव जीवन के लिए प्रेरणा
यह पर्व मनुष्य को सिखाता है कि वास्तविक ‘दिवाली’ तब होती है जब हम अपने भीतर के ‘नरकासुर’ को समाप्त करें।
अंतरमन में प्रेम, करुणा और सच्चाई का दीप जलाना ही इस पर्व का सच्चा उत्सव है।
निष्कर्ष
आज जब देश दीपों से आलोकित है, तब यह पर्व केवल रोशनी का नहीं, बल्कि अंधकार से मुक्ति और मानवता की पुनर्स्थापना का प्रतीक है।
जैसा कि संत श्यामानंद जी महाराज कहते हैं
“जब मन का अंधकार मिटता है, तभी सच्ची दीपावली होती है।”