संत पंडित श्यामानंद जी महाराज, वृंदावन
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“चौरासी कोस निरंतर खेलत है बाल मोहन” — यही वह ब्रज भूमि है जहां प्रकृति और परमात्मा साथ-साथ विचरण करते हैं। ब्रज भूमि, जिसका केंद्र मथुरा है, केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि एक जीवंत आध्यात्मिक अनुभूति है। यहाँ की धूल में भी राधा-कृष्ण की लीलाओं की सुगंध रची-बसी है, और यहाँ की हवाओं में हर क्षण भक्ति की स्वर लहरियाँ बहती हैं।

ब्रज भूमि का भूगोल: जहाँ प्रकृति स्वयं आराधना करती है
ब्रज क्षेत्र का आकर गोल है, जिसकी सीमाएँ ऐतिहासिक व पौराणिक दृष्टिकोण से चार दिशाओं में विस्तृत हैं:
पूर्व दिशा में हास्य वन, जो आज के अलीगढ़ जिले के बरहद गांव में स्थित है।
पश्चिम में उपहार वन, जो वर्तमान में हरियाणा के गुरुग्राम में सोन नदी के किनारे था।
उत्तर में मधुवन, जो शेरगढ़ तक फैला था।
दक्षिण में जहुन, जो आगरा जिले के बटेश्वर तक विस्तारित था।

साहित्यकार और संतों ने इस भूमि की परिभाषा बड़े भावपूर्ण शब्दों में दी:
“इत बरहद, उत सोन हद, उत शूरसेन को गांव।
ब्रज चौरासी कोस में, मथुरा मंडल धाम।।”
यह चौरासी कोस की परिक्रमा वाली भूमि न केवल ऐतिहासिक दृष्टि से विशिष्ट है, बल्कि भूगोल की दृष्टि से भी अत्यंत समृद्ध है। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने 7वीं शताब्दी में मथुरा की सीमा को 833 मील बताया था, जो इसकी सांस्कृतिक और व्यापारिक महत्ता को सिद्ध करता है।








