सिर्फ सड़क ही नहीं, न्याय भी साफ कीजिए साहब!

मनोज चौधरी

__________________मथुरा

सिर्फ सड़क ही नहीं, न्याय भी साफ कीजिए साहब!

नगर निगम मथुरा वृंदावन द्वारा की गई अतिक्रमण हटाने की कर्रवाई

दीपावली से पहले फुटपाथ से उड़ाई रोज़ी-रोटी, लेकिन नेता जी का टीनशेड जस का तस

नगर निगम मथुरा-वृन्दावन द्वारा शनिवार को चलाया गया अतिक्रमण हटाओ अभियान कागज़ों पर तो सफ़ल रहा, लेकिन ज़मीन पर एक गहरी असमानता की परत खोल गया।

जहां सड़क किनारे सब्जी, फल, चाट, और छोटे दुकानदारों के ठेले, कुर्सियाँ, बैनर, तिरपाल हटाए गए—वहीं शहर के बीचोंबीच स्थित अस्पतालों के सामने बनी अवैध पार्किंग और एक भाजपा विधायक का टीनशेड untouched रहा।

क्या अतिक्रमण की परिभाषा अब हैसियत देखकर तय होगी?

प्रशासन कहता है कि शहर को सुगम और स्वच्छ बनाया जा रहा है। यह लक्ष्य सराहनीय है।
लेकिन जब कार्रवाई सिर्फ गरीब के ठेले तक सीमित रह जाए, और रसूखदारों की संरचनाओं को नजरअंदाज़ किया जाए—तो यह “साफ-सफाई” नहीं, साफ पक्षपात कहलाता है।

दीपावली से पहले तोड़ी उम्मीदें

यह समय वह है जब छोटे दुकानदार, ठेलेवाले और पटरी पर बैठने वाले लोग कुछ कमाकर अपने बच्चों को नया कपड़ा, मिठाई या दीपक दिलाने का सपना देखते हैं।

अब जब दीपावली बस कुछ ही दिन दूर है, उन लोगों से बिना कोई वैकल्पिक व्यवस्था दिए उनका रोज़गार छीन लेना क्या प्रशासन की क्रूरता नहीं है?

एक दुकानदार ने कहा,
“बड़े लोगों की बिल्डिंग पर कुछ नहीं बोलते। हम तो बस पेट पालते हैं। दीपावली अंधेरी ही होगी साहब!”

क्या यह ‘स्मार्ट सिटी’ है या ‘सेलेक्टिव सिटी’?

नगर निगम के प्रेस नोट में जुर्माने की राशि 9500 रुपए- और जब्त सामग्री की सूची लंबी है। लेकिन उसमें वह जगहें नहीं हैं जहां वर्षों से स्थायी अवैध कब्जे हैं।

क्या नेता का टीनशेड अतिक्रमण नहीं? है तो फिर हटती क्यों नहीं?

क्या अस्पताल के बाहर जाम फैलाने वाली पार्किंग अछूत है?

क्या कार्रवाई सिर्फ फोटो खिंचवाने के लिए थी?

समाधान क्या है?

शहर की सुंदरता ज़रूरी है, लेकिन समानता उससे कहीं ज़्यादा ज़रूरी है।
प्रशासन को चाहिए कि:

1. हर अतिक्रमण पर एक जैसा नियम लागू करे—चाहे वह छोटा दुकानदार हो या कोई राजनेता।

2. गरीब तबके के लिए वैकल्पिक स्थल या साप्ताहिक हाट की व्यवस्था करे।

3. विशेषकर त्यौहारों से पहले संवेदनशील और मानवीय दृष्टिकोण अपनाए।

 

न्याय की भी सफ़ाई कीजिए

नगर निगम की इस मुहिम को देखकर लगता है कि सफाई सिर्फ सड़कों की हुई है, लेकिन न्याय अभी भी धूल-धक्कड़ में छिपा है।

इस दीपावली पर अगर प्रशासन सचमुच शहर को रोशन देखना चाहता है, तो उसे पहले हर नागरिक के साथ समान व्यवहार करना सीखना होगा।