वैष्णव आंदोलन में धर्म का मेरुदंड रहा मथुरा

मनोज चौधरी

क्या आप जानते हैं कि हिंदू धर्म का मेरुदंड मथुरा का आकार गोल है। इसके पूर्व में हास्य वन (अलीगढ़ जिले का बरहद गांव, पश्चिम में उपहार वन(गुरुग्राम जिले की सोन नदी के किनारे तक), उतर में भुवन वन (शेरगढ़ का भूषण वन) और दक्षिण में जह्वूवान (आगरा का बटेश्वर गांव) तक इस नगर की सीमाएं फैली थी।

1560 में श्रीनारायण भट्ट ने अपनी पुस्तक ब्रज भक्ति विलास ग्रन्थ में इसका उल्लेख किया  है।

” इत बरहद गांव उत सोनहद, उत शूरसेन को गांव।

बृज चौरासी कोस में मथुरा मंडल धाम”।।

सूरदास जी ने लिखा

” बृज चौरासी कोस निरंतर खेलत है बाल मोहन”।।

आज हम आपको उसी मथुरा की यात्रा की जानकारी दे रहे हैं, जो प्राचीन काल में शूरसेन प्रदेश था। सातवीं शताब्दी में जब चीनी यात्री हुएन – सांग मथुरा भ्रमण पर आया तो उसने लिखा शूरसेन प्रदेश 833 मील में फैला हुआ है। वराह पुराण मथुरा मंडल का विस्तार 20 योजन बताया गया है। इसी क्षेत्र को बृज कहा गया। बृज का केंद्र मथुरा है। बृज का अर्थ भी गोचर भूमि है। यहां बड़े बड़े भूभाग पर पशुओं के चरागाह थे। इसलिए बृज वन क्षेत्र थे और इसकी चौरासी कोस यात्रा को वन यात्रा भी कहा जाता है।

एक एक वन की जानकारी आगे आप तक पहुंचाई जाएगी। बृज क्षेत्र के 12 वन और 24 उपवन भगवान श्रीकृष्ण और उनके अग्रज भ्राता बलराम जी शौर्य और पराक्रम की गाथा से गूंथे हैं। हमारे आराध्य श्रीकृष्ण की प्रेयसी राधा जी के प्रेम से ओतप्रोत भी हैं। पहाड़ियों से घिरे मथुरा की उत्तर पश्चिमए अरावली पर्वत की श्रृंखला हैं, दक्षिण में नंदगांव की पहाड़ी है और इसी पर नंदबाबा मंदिर है। मुख्य चरण पहाड़ी है, जबकि दक्षिण पूर्व में गिरिराज पर्वत है। क्या आप जानते हैं कि यह पर्वत पांच मील में फैला हुआ है और इसकी ऊंचाई सौ फीट है। पवित्र नदी यमुना मथुरा में सौ मील में होकर बहती है। इसकी दो सहायक नदिया पथवाह और करबन नदिया है। पथवाह अलीगढ़ से और करबन नदी सादाबाद कस्बे से निकलर यमुना नदी में गिरती हैं। 15 -16 वीं शताब्दी में वैष्णव आंदोलन हुआ तो ब्रज का केंद्र मथुरा ही धर्म का मेरुदंड रहा था।

आगे जानेंगे,  मथुरा कैसे बसा। रामायण में भी इसका  उल्लेख मिलता है। इसे जानने के लिए बने रहिए हमारे साथ।