जठराग्नि को शांत कराना सबसे बड़ा यज्ञ: बालयोगी महराज![]()
– सौंख खेड़ा (कारब) की ब्रजानंद बाबा की मढी पर हुआ विशाल भंडारा
-गरीबों को वितरित किए गए कंबल, हजारों साधु संत और भक्त हुए कार्यक्रम में शामिल
मथुरा: तीन तरह की अग्नि होती है। एक है, बड़वाग्नि जो कि भू-गर्भ के अंदर होती है और उसका ताप समुद्र जल को खौलाती है। जंगल में लगने वाली आग दावाग्निी होती है, जबकि पेट के अंदर शारीरिक ताप है, जो भोजन को पचाने का कार्य करती है। हम जंगल और जल से यज्ञ में आहूति देते हैं और मानते हैं कि वह भगवान को प्राप्त होगा। पर हमे यह नहीं पता, कि वह भगवान को प्राप्त होती भी या नहीं। मगर, इतना तय है, जठाराग्नि भोजन से ही शांत होती है और इसलिए आश्रम पर पंगत का मकर संक्रांति पर आयोजन किया जाता है और यही सबसे बड़ा यज्ञ है।
सौंख खेड़ा (कारब) की ब्रजानंद बाबा की मढी स्थित राष्ट्रीय संत कार्ष्णि ब्रह्मानंद बालयोगी महाराज ने मकर संक्रांति पर श्रीमद्भागवत कथा संत सम्मेलन और कंबल वितरण कार्यक्रम में प्रवचन करते हुए कहा, भगवान की तुलना से मां से की गई है। जिस तरह एक मां अपने बेटे को सुबह स्कूल भेजती है और उसके लौटने का इंतजार भी करती है। ठीक, उसी प्रकार भगवान ने हम सभी को इस पृथ्वी पर भेजा और वह भी हमारे लौटने का इंतजार करते हैं। इसलिए मानव जीवन मिला है, वह पृथ्वी पर आकर सत कर्म करे। दान पुण्य करें। गलत कार्याें से दूर रहे। वह गलत कार्य मानव करेगा तो वह भगवान के पास नहीं जा पाएगा बल्कि वह नरक में जाएगा। संत बालयोगी ने कहा, मानव जीवन में हमेशा ही सतकर्म संकट के समय काम आते हैं। उन्होंने द्रोपदी के चीरहरण का जिक्र करते हुए कहा, द्रोपदी के काम संकट के समय उसके स्वजन भी काम नहीं आए, काम आया तो वह सतकर्म, जब शिशुपाल वध के दौरान सुदर्शन चक्र से भगवान श्रीकृष्ण की अंगुल कट कई तो द्रोपदी ने अपनी साड़ी से एक चीर फाड़कर भगवान की अंगुली से बांध दी थी। वह चीर द्रोपदी के चीरहरण में काम आई। संत का कहना था, इसलिए मानव को जीवन पर्यंत सतकर्म ही करने चाहिए। इससे पहले राष्ट्रीय संत कार्ष्णि ब्रह्मानंद बालयोगी महाराज के ब्रजानंद बाबा की मढी सौंख खेड़ा स्थित आश्रम पर 22 वां वार्षिकोत्सव बड़े ही भक्ति भाव से मनाया गया। श्रीमद्भागवत कथा संत सम्मेलन और कंबल वितरण का भी आयोजन इस मौके पर किया गया। श्रीमद्भागवत कथा पांच से ग्यारह जनवरी तक हुई और उसके बाद 12 से 14 जनवरी तक हुए संत सम्मेलन के समापन पर प्रसाद वितरण (पंगत) भी किया गया। इसमें हजारों साधु संत और भक्तगण शामिल हुए। हजारों गरीबों को कंबल वितरित किए गए।








