पंचायतों में नया दांव: प्रधान बने प्रशासक, सरकार ने साधा सियासी गणित

 

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप यादव

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मथुरा।

उत्तर प्रदेश में पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद सरकार द्वारा ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक बनाए जाने का फैसला अब प्रशासनिक से ज्यादा राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है। अब तक यह जिम्मेदारी एडीओ पंचायत को मिलती रही थी, लेकिन मुख्यमंत्री Yogi Adityanath की सरकार ने परंपरा बदलते हुए नया प्रयोग कर दिया।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पंचायत चुनाव से पहले सरकार ने एक बड़ा सियासी दांव चला है। प्रदेश में लाखों प्रधान और उनके समर्थकों का सीधा प्रभाव गांवों की राजनीति पर पड़ता है। ऐसे में प्रधानों को प्रशासक बनाकर सरकार ने गांव स्तर पर अपना नेटवर्क मजबूत करने की कोशिश की है।

दरअसल, पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद गांवों की विकास योजनाओं और प्रशासनिक व्यवस्थाओं का संचालन प्रशासक के माध्यम से होता है। पहले यह जिम्मेदारी एडीओ पंचायत संभालते थे, जिससे सरकारी अफसरशाही का सीधा नियंत्रण रहता था। लेकिन इस बार सरकार ने वही अधिकार प्रधानों को देकर नई बहस छेड़ दी है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला सिर्फ प्रशासनिक सुविधा नहीं, बल्कि आगामी पंचायत चुनाव और 2027 के राजनीतिक समीकरणों को ध्यान में रखकर लिया गया कदम माना जा रहा है। गांवों में प्रधान ही सबसे सक्रिय राजनीतिक इकाई होते हैं। ऐसे में उन्हें पद पर बनाए रखने से भाजपा को जमीनी स्तर पर संगठनात्मक लाभ मिलने की उम्मीद है।

हालांकि फैसले से एडीओ पंचायत वर्ग में नाराजगी भी बताई जा रही है। विभागीय सूत्रों के अनुसार, कई कर्मचारी संगठन इस बदलाव को अपने अधिकारों में कटौती मान रहे हैं। यदि विरोध बढ़ा तो मामला अदालत तक भी पहुंच सकता है।

 

राजनीतिक जानकार यह भी मानते हैं कि सरकार ने जोखिम और लाभ दोनों का आकलन करके ही यह निर्णय लिया है। गांवों में भले कुछ लोग अपने प्रधानों से नाराज हों, लेकिन हर प्रधान का अपना सामाजिक और जातीय प्रभाव होता है। यही वजह है कि सरकार ने अफसरशाही की जगह जनप्रतिनिधियों पर भरोसा जताकर नया संदेश देने की कोशिश की है।

पंचायतीराज मंत्री Om Prakash Rajbhar पहले लगातार समय पर पंचायत चुनाव कराने की बात कहते रहे, लेकिन अब प्रशासक व्यवस्था में बदलाव ने चुनावी रणनीति को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

फिलहाल गांवों में चर्चा यही है कि सरकार ने पंचायत राजनीति में ऐसा दांव खेला है, जिससे प्रधान संगठन खुश हैं, जबकि प्रशासनिक अमला असहज नजर आ रहा है। आने वाले दिनों में यह फैसला राजनीतिक रूप से कितना असर दिखाएगा, इस पर सबकी निगाहें टिकी हैं।