धरती माता बचाओ अभियान: खेती, किसान और भविष्य की जमीन का सवाल

मनोज चौधरी मथुरा

धरती केवल उत्पादन का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक चेतना और भविष्य की आधारशिला है। लेकिन आज वही धरती माता रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध प्रयोग से बीमार होती जा रही है। “धरती माता बचाओ अभियान” इसी चिंता की गंभीर अभिव्यक्ति है, जो यह संकेत देता है कि यदि अब भी संतुलन नहीं साधा गया, तो आने वाली पीढ़ियों को उपजाऊ खेत नहीं, बल्कि थकी हुई जमीन विरासत में मिलेगी।

बैठक में दिशा निर्देश देते डीएम सी पी सिंह

पिछले कुछ दशकों में खेती को अधिक उत्पादन की दौड़ में झोंक दिया गया। गोबर की खाद, हरी खाद और जैविक तरीकों को हाशिये पर रखकर यूरिया, डीएपी, एनपीके और पोटाश पर अत्यधिक निर्भरता बढ़ी। इसका परिणाम यह हुआ कि मृदा में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश का संतुलन बिगड़ गया और जिंक, बोरॉन जैसे सूक्ष्म तत्वों की भारी कमी सामने आने लगी। यह तथ्य केवल आशंका नहीं, बल्कि मृदा परीक्षण रिपोर्टों की ठोस सच्चाई है। इसके बावजूद उत्पादन में कोई उल्लेखनीय वृद्धि खेतों में दिखाई नहीं देती, भले ही कागजी आंकड़े कुछ और कहानी कहते हों।

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मथुरा में 13 जनवरी 2026 को जिलाधिकारी चंद्र प्रकाश सिंह की अध्यक्षता में हुई बैठक इस दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। “धरती माता बचाओ अभियान” के अंतर्गत ग्राम, तहसील और जिला स्तर पर त्रिस्तरीय समितियों का गठन इस बात का संकेत है कि अब समस्या को केवल सलाह तक सीमित नहीं रखा जाएगा, बल्कि जमीन पर कार्रवाई होगी। 100 ऐसी ग्राम पंचायतों की पहचान, जहां रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक प्रयोग हुआ है, और वहां विशेष अभियान चलाने का निर्णय स्वागत योग्य हो।

यह भी सकारात्मक संकेत है कि वर्ष 2025-26 में रासायनिक उर्वरकों की खपत में कमी दर्ज की गई है। किंतु यह कमी तभी सार्थक मानी जाएगी, जब इसके साथ गोबर की खाद, कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट और जैविक तरीकों का वास्तविक प्रोत्साहन हो। केवल उर्वरक घटा देना पर्याप्त नहीं, बल्कि मृदा की सेहत को पुनर्जीवित करना असली लक्ष्य होना चाहिए।

उर्वरकों की कालाबाजारी, ओवररेटिंग और तस्करी पर सख्त निगरानी तथा दोषी डीलरों पर एफआईआर, गिरफ्तारी और लाइसेंस निलंबन जैसी कार्रवाई आवश्यक है। कृषि ग्रेड यूरिया का औद्योगिक उपयोग में डाइवर्जन न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि किसानों के हक पर भी डाका है। सीमाओं पर चेकिंग और जिला स्तरीय निगरानी टीमें इस दिशा में निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं।

धरती माता बचाओ अभियान केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि चेतना का आंदोलन बनना चाहिए। जब तक किसान मृदा परीक्षण को खेती का अनिवार्य हिस्सा नहीं बनाएगा और समाज रसायन मुक्त खेती के महत्व को नहीं समझेगा, तब तक प्रयास अधूरे रहेंगे। धरती माता को बचाना दरअसल अपनी आने वाली पीढ़ियों के जीवन को सुरक्षित करना है। आज संतुलित खेती का जो बीज बोया जाएगा, वही कल समृद्ध भारत की फसल बनेगा।