मनोज चौधरी
मकर संक्रांति सनातन हिंदू धर्म का ऐसा पर्व है, जो केवल आस्था नहीं बल्कि सूर्य विज्ञान, काल गणना और आध्यात्मिक चेतना से जुड़ा हुआ है। जब सूर्य धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करता है, तभी मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाता है। यही कारण है कि यह त्योहार तिथि आधारित न होकर सूर्य के गोचर पर निर्भर करता है। इस वर्ष मकर संक्रांति 15 जनवरी 2026 को मनाई जाएगी।

क्यों मनाई जाती है मकर संक्रांति
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मकर संक्रांति से सूर्य की उत्तरायण गति प्रारंभ होती है। सनातन धर्म में वर्ष को उत्तरायण और दक्षिणायन—दो भागों में बांटा गया है। उत्तरायण को देवताओं का दिन, प्रकाश और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना गया है। इसी कारण इस दिन जप, तप, स्नान, दान, तर्पण और श्राद्ध जैसे धार्मिक कर्मों को विशेष पुण्यकारी माना जाता है।
पौराणिक मान्यताएं और धार्मिक आधार
मान्यता है कि मकर संक्रांति के दिन भगवान विष्णु ने असुरों का संहार कर उनके सिरों को मंदार पर्वत में दबाकर युद्ध की समाप्ति की घोषणा की थी। इसलिए इस पर्व को बुराइयों के अंत और शुभता के आरंभ का प्रतीक माना जाता है।
एक अन्य मान्यता के अनुसार भगवान सूर्य इस दिन अपने पुत्र शनि देव से मिलने स्वयं उनके गृह मकर राशि में प्रवेश करते हैं। शनि मकर राशि के स्वामी हैं, इसी कारण इस पर्व को मकर संक्रांति कहा गया।
गीता में उत्तरायण का उल्लेख
भगवद्गीता के आठवें अध्याय के 24वें श्लोक में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तरायण काल को श्रेष्ठ बताया है—
“अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः॥”
अर्थात उत्तरायण, प्रकाश, शुक्ल पक्ष और शुभ काल में देह त्याग करने वाले ब्रह्मज्ञानी ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।
भीष्म पितामह और उत्तरायण
महाभारत में पितामह भीष्म ने सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर स्वेच्छा से देह त्याग किया था। धार्मिक मान्यता है कि उत्तरायण में शरीर त्याग करने वाली आत्माएं मोक्ष या देवलोक को प्राप्त करती हैं, जबकि दक्षिणायन को आत्मा के लिए कठिन काल माना गया है।
संत श्यामानंद जी महाराज का संदेश








