ब्रज में बंदरों की त्रासदी, आस्था की भूमि पर संवेदना की परीक्षा

दिलीप यादव मथुरा 

श्रीकृष्ण की लीलाभूमि ब्रज में आज सबसे असहाय अगर कोई है, तो वह है भगवान के ही माने जाने वाले भक्त—बंदर। बढ़ती आबादी, सिमटते जंगल, भोजन की कमी और प्रशासनिक असफलताओं के बीच मथुरा–वृंदावन के बंदर न सिर्फ इंसानों के लिए समस्या बने हैं, बल्कि खुद गंभीर पीड़ा और क्रूरता का शिकार भी हो रहे हैं।

22 हजार बंदर, पर समाधान शून्य

2019 में कराए गए एक सर्वे में मथुरा जिले में करीब 22 हजार बंदर पाए गए थे। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए चुरमुरा और अकोस गांव में बंदर सफारी के लिए भूमि भी चिन्हित की गई। इसके लिए लगभग एक अरब रुपये का प्रस्ताव शासन को भेजा गया, लेकिन बजट स्वीकृत नहीं हो सका।

चंबल सेंचुरी में बंदरों को स्थानांतरित करने की अनुमति भी मांगी गई, मगर प्रदेश के सभी जिलों से एक जैसी रिपोर्ट आई—“हमारे यहां पहले से ही बंदर हैं, और नहीं रख सकते।” नतीजा यह कि बंदरों को कहीं ठौर नहीं मिला।

फलदार वृक्षों की कमी, भूख से आक्रामकता

शहरों और गांवों में तेजी से घटते फलदार वृक्षों ने बंदरों की प्राकृतिक भोजन व्यवस्था तोड़ दी है। भूख से बेहाल बंदर कभी बाजार में बच्चों के हाथ से थैली छीनते हैं, तो कभी विदेशी पर्यटकों का चश्मा उतारकर उन्हें फ्रूटी पिलाने को मजबूर करते दिखते हैं।

गोवर्धन और वृंदावन जैसे क्षेत्रों में परिक्रमा मार्ग पर तो उन्हें कुछ भोजन मिल जाता है, लेकिन बाकी दिनों में उनकी उदरपूर्ति एक बड़ा सवाल बनी रहती है।

झटका मशीन बनी मौत का जाल

बंदरों की पीड़ा यहीं खत्म नहीं होती। वृंदावन की गौरा नगर कॉलोनी में हाल ही में एक बंदर इलेक्ट्रिक फेंसिंग यानी झटका मशीन से बुरी तरह जल गया। बताया जाता है कि एक आश्रम की बाउंड्री पर लगी इस इलेक्ट्रिक फेंसिंग से चिपकने के कारण बंदर का हाथ जल गया और वह कई दिनों तक घायल अवस्था में भटकता रहा।

ब्रजभूमि, जहां अन्न-भंडारों और भंडारों की भरमार है, वहीं इन वन्यजीवों के साथ ऐसी क्रूरता ने मानवता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

गोशालाएं, डॉग फीडिंग सेंटर, पर बंदरों के लिए कुछ नहीं

मथुरा-वृंदावन क्षेत्र में सैकड़ों गोशालाएं हैं। नगर निगम ने कुत्तों के लिए फीडिंग सेंटर बना दिए हैं और गोशालाओं की तर्ज पर सांड शालाएं भी खुल चुकी हैं। लेकिन बंदरों के लिए न कोई आश्रय है, न पुनर्वास केंद्र।

कुछ धर्मावलंबी जरूर केले, गाजर आदि डालकर उनकी क्षुधा शांत करने की कोशिश करते हैं, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है।

पकड़ो और छोड़ो की नीति भी फेल

बंदरों को एक जगह से पकड़कर दूसरी जगह छोड़ने का प्रयोग भी नाकाम साबित हुआ है। जहां भी छोड़े जाते हैं, वहां की नजदीकी बस्तियों में पहुंचकर वही उत्पात और संघर्ष दोहराते हैं। लोग अपनी समस्या से तो राहत पा लेते हैं, लेकिन दूसरों के लिए नई समस्या खड़ी कर देते है।

 

जिम्मेदार कौन? विभागों में तालमेल का अभाव

घायल बंदर के उपचार को लेकर जिला गंगा समिति सदस्य दिलीप कुमार यादव ने जब अधिकारियों से संपर्क किया, तो जिम्मेदारियों का बंटवारा सामने आया—

बंदर पकड़ना स्थानीय इकाई का काम, इलाज पशु चिकित्सा विभाग का और वन विभाग का कहना कि आबादी में रहने वाले बंदरों से उसका कोई संबंध नहीं।

जिला वन अधिकारी वेंकटा श्रीकर पटेल (आईएफएस) ने कहा कि आगामी बैठक में सभी विभागों के साथ समन्वय कर बंदरों की समस्या और उनसे उत्पन्न जनसमस्याओं पर विचार किया जाएगा।

आस्था की भूमि में संवेदना की परीक्षा

ब्रजभूमि में बंदर सिर्फ एक समस्या नहीं, बल्कि आस्था से जुड़े प्राणी हैं। लेकिन आज वे आस्था, प्रशासन और विकास के बीच फंसे हुए हैं। जब तक ठोस नीति, बजट और मानवीय दृष्टिकोण के साथ समाधान नहीं निकाला जाएगा, तब तक यह जीवंत लेकिन गंभीर कहानी यूं ही सड़कों, कॉलोनियों और परिक्रमा मार्गों पर दोहराती रहेगी।