मनोज चौधरी, मथुरा
आज यह संयोग नहीं, बल्कि चेतावनी है कि आयुर्वेद, होम्योपैथी और एलोपैथी—तीनों चिकित्सा पद्धतियों के चिकित्सक एक स्वर में रोगियों को बाहर का खाना न खाने की सलाह दे रहे हैं। सवाल यह नहीं कि डॉक्टर ऐसा क्यों कह रहे हैं; असली सवाल यह है कि बाज़ार की थाली में आखिर ऐसा क्या परोसा जा रहा है, जो दवा से पहले ही बीमारी का कारण बन रहा है?
मथुरा जनपद में हालिया छापामार कार्रवाइयों ने इस प्रश्न का भयावह उत्तर सामने रख दिया है। गोवर्धन पूजा और भाईदूज जैसे पावन पर्वों के अवसर पर, जब शुद्धता और प्रसाद की भावना सर्वोपरि होनी चाहिए थी, तब अस्वच्छ हालात में ढोया जा रहा लगभग 880 किलोग्राम दूषित पनीर नष्ट कराया गया। डेयरी से दूषित मिल्क क्रीम और घी जब्त हुए। बरसाना में प्रसाद के रूप में वितरित होने वाले पेड़ों के नमूने जांच के लिए भेजे गए। वृंदावन में सोया सॉस और वेज चटनी तक संदिग्ध पाई गईं। और सबसे चिंताजनक—ब्रांडेड भरोसे की आड़ में डुप्लीकेट कार्बोनेटेड ड्रिंक की सैकड़ों पेटियाँ जब्त हुईं।
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यह सिर्फ आंकड़ों की सूची नहीं है; यह हमारी रोज़मर्रा की थाली का एक्स-रे है। पनीर में मिलावट का मतलब केवल स्वाद की चोरी नहीं, बल्कि प्रोटीन के नाम पर रसायन। दूध और घी में गड़बड़ी का अर्थ बच्चों की हड्डियों और बुज़ुर्गों की प्रतिरोधक क्षमता पर सीधा प्रहार। नकली पेय पदार्थ केवल पेट नहीं बिगाड़ते, वे किडनी, लिवर और तंत्रिका तंत्र पर दीर्घकालिक चोट छोड़ते हैं—वह चोट जो वर्षों बाद कैंसर, हार्मोनल विकार और मेटाबॉलिक बीमारियों के रूप में सामने आती है।
प्रशासन की सक्रियता सराहनीय है—नमूनों का संग्रह, सीज़ की कार्रवाई, प्रयोगशाला जांच और एफआईआर। लेकिन सच यह भी है कि हर त्योहार से पहले छापे लगें और बाद में हम राहत की सांस लें—यह स्थायी समाधान नहीं। मिलावटखोरी एक संगठित अपराध बन चुकी है, जिसमें मुनाफ़े की भूख कानून से तेज़ दौड़ती है। यदि आज यह नहीं रुकी, तो कल हमारे बच्चों के लिए “बाहर का खाना” नहीं, बल्कि “बाहर की ज़िंदगी” भी सुरक्षित नहीं रहेगी।
भविष्य का खतरा स्पष्ट है। मिलावट सामान्य हुई तो बीमारियाँ असामान्य नहीं रहेंगी। अस्पतालों का बोझ बढ़ेगा, इलाज महंगा होगा, और भरोसा—जो सबसे कीमती है—टूटता जाएगा। समाज का स्वास्थ्य केवल डॉक्टरों या छापामार दलों की जिम्मेदारी नहीं। यह उपभोक्ता की सजगता, कारोबारियों की नैतिकता और कानून की निरंतर सख्ती—तीनों का साझा इम्तिहान है।
आज जरूरत है कि शुद्धता को पर्व-विशेष की कार्रवाई नहीं, निरंतर अभियान बनाया जाए। अनुज्ञप्ति का सार्वजनिक प्रदर्शन, स्वच्छता का पालन, ढके खाद्य पदार्थ, और दोष सिद्ध होने पर कठोर दंड—ये विकल्प नहीं, अनिवार्यता हों। साथ ही, उपभोक्ता भी सस्ते के मोह से बाहर आए; क्योंकि सस्ता आज महंगा कल बनता है—स्वास्थ्य की कीमत पर।
बाज़ार की थाली में ज़हर है—यह कहना अतिशयोक्ति नहीं। चेतावनी साफ है: यदि हमने अभी नहीं संभाला, तो आने वाली पीढ़ियाँ स्वाद नहीं, सर्वाइवल चुनने को मजबूर होंगी। शुद्ध भोजन अब सुविधा नहीं, अधिकार है—और इस अधिकार की रक्षा आज ही करनी होगी।








