वृंदावन के संत पंडित श्यामानंद जी महाराज कहते हैं —
ब्रजभूमि की धूल केवल मिट्टी नहीं, यह तो श्रीकृष्ण प्रेम का राग है। जब यह रज तन से लगती है, तो मन के भीतर बाँसुरी बज उठती है — वही बाँसुरी, जो आत्मा को परमात्मा से जोड़ देती है।”
कथा है कि जब भगवान विष्णु ने तीर्थराज प्रयाग को ब्रज की महिमा सुनाई, तब तीर्थराज स्वयं मथुरा पहुँचे और इस भूमि की रज को पूजन कर नतमस्तक हुए। एक अन्य कथा के अनुसार, उन्होंने घोड़े का रूप धारण कर ब्रज की रज में लोट लगाई, क्योंकि इसी धूल में श्रीकृष्ण के चरणों का प्रेम बसा था।
पंडित श्यामानंद जी महाराज कहते हैं —
पंडित श्यामानंद जी महाराज
यह रज मनुष्य को केवल भक्त नहीं बनाती, उसे स्वयं प्रेम का स्वरूप बना देती है। जो इसके स्पर्श से भीग गया, वह सांसारिक बंधनों से मुक्त हो गया।” ब्रज की इस रज की महिमा तो भक्त कवियों ने युगों पहले गाई थी।
सूरदास जी ने कहा —
ब्रज छूटे बैकुंठ न जाऊँ, तेहि ब्रज धूरि लपेटनु पाऊँ। जहाँ नटवर नागर नाचत गोपी, तेहि ब्रज रहौं बसाऊँ।”
उनके लिए ब्रज की रज बैकुंठ से भी श्रेष्ठ थी — क्योंकि वहाँ स्वयं श्रीकृष्ण नाचते हैं, और गोपियाँ प्रेम में लीन रहती हैं।
रसखान ने भी इसी प्रेम में कहा
“मानस हो तो बसे ब्रज, गोकुल गाँव के ग्वाल।”
उनके लिए मोक्ष का अर्थ था — उस भूमि पर जन्म लेना जहाँ हर धूलकण में कृष्ण की लीलाएँ बसी हैं। और जब उद्धव श्रीकृष्ण का संदेश लेकर ब्रज पहुँचे, तो गोपियों ने उत्तर में कहा “उद्धव! मन न भाय ब्रज बिन, ब्रज की धूरि समुत कोटि बैकुंठ सुख नाहीं।” गोपियों के लिए वैकुंठ का वैभव भी उस ब्रज की धूल के सामने तुच्छ था।
कबीर ने भी कहा था
“माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रोंदे मोहे। एक दिन ऐसा आएगा, मैं रोंदूंगी तोहे।”
और ब्रज की यह माटी तो वही है जो देवों को भी झुका दे, ऋषियों को रुला दे।
पंडित श्यामानंद जी महाराज कहते हैं
“यहाँ की रज राग बनती है, जो मन को भक्ति में पिरो देती है। जो एक बार इस भूमि को छू ले, उसका हृदय श्रीकृष्ण के प्रेम से भर जाता है।”
वृंदावन — जहाँ धूल भी भक्ति है, रज भी राग है, और हर प्राण में श्रीकृष्ण का नाम।