वृंदावन की मिट्टी में वह शक्ति है, जो तन ही नहीं, मन को भी जवान कर देती है।
ब्रज रज की ही तो महिमा है ,जो कभी भक्ति को वृद्धा से युवती बना देती है, तो कभी जीवन से थके मानव को नई उमंग दे देती है। संत पंडित श्यामानंद जी महाराज कहते हैं, “ब्रज की यह भूमि केवल धरती नहीं, यह भगवान श्रीकृष्ण के चरणों की धूल है। यहाँ आते ही मनुष्य अपने दुःख, थकान को भूल जाता है, और भीतर से नवजीवन का अनुभव करता है।
संत पंडित श्यामानंद जी महाराज
वृंदावन के संत पंडित श्यामानंद जी महाराजबताते हैं कि श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णन है कि जब नारदजी ने वृद्ध भक्ति और उसके निर्बल पुत्र ज्ञान-वैराग्य को देखा, तब उन्होंने भागवत कथा का यज्ञ किया। उसी कथा से भक्ति फिर से युवा हो गई। यही दृश्य वृंदावन में आज भी जीवंत दिखाई देता है। यहाँ हर कथा, हर कीर्तन, हर नाम-संकीर्तन में भक्ति का वह ही नवजीवन झलकता है।
संत श्यामानंद जी महाराज कहते हैं — “वृंदावन में जो भक्त आते हैं, वे केवल दर्शन नहीं करते, यहाँ उनकी आत्मा जागती है। जो शरीर से वृद्ध हैं, वे भी मन से युवाओं की तरह उल्लसित हो उठते हैं, क्योंकि यहाँ की रज में स्वयं श्रीकृष्ण की लीला का तेज समाया हुआ है।
ब्रज रज की महिमा, जहाँ धूल में भी है दिव्यता
ब्रजभूमि की धूल को साधारण धूल नहीं कहा जा सकता। संतों का कहना है
— “यह वही रज है, जिसमें राधा-कृष्ण के चरणों के निशान हैं। यही कारण है कि यह रज स्पर्श मात्र से शरीर में नई चेतना जगा देती है।”
भक्तों का विश्वास है कि वृंदावन की गलियों में चलते हुए जो रज पैरों से लगती है, वही मनुष्य के जीवन के अंधकार को मिटा देती है।