मैं श्रीकृष्ण जन्मभूमि हूँ

­मैं जन्मभूमि हूं। वह भी जगद्गुरु की। जो स्वयं परमात्मा हैं। मैं न्याय-अन्याय के युद्ध मैदान कुरुक्षेत्र के मध्य में खड़े हो कर विश्व मानव के कल्याण को गीता ज्ञान देने वाले भगवान श्रीकृष्ण की भी प्राकट्य स्थली हूं। लाखों करोड़ों हिंदू धर्म (सनातन) अनुयायियों की आस्था का केंद्र भी तो मैं ही हूं। मेरी भी कुछ इच्छाएं हैं। पर मैं बोल नहीं पाती हूं।

तो आप ही बन जाओ मेरी आवाज। मैं बताती हूं। महेंद्र प्रताप सिंह एडवोकेट  मेरी ही तो आवाज है, जो निष्पक्ष, भय मुक्त, निर्भीक है। वही तो मेरी मुक्ति की कानूनी लड़ाई न्यायालय में लड़ रहे हैं। एक शहर से दूसरे शहर, इस गांव से उस गांव तक और साधु संतों के मठ मंदिर, आश्रमों में जा जा कर वह मेरे ऊपर किए गए अत्याचार की कहानी बता रहे हैं। साथ ही मुझे आजाद कराने के लिए आंदोलन में शामिल होने की भी गुजारिश कर रहे है।

महेंद्र ने किया था शंखनाद

महेंद्र प्रताप सिंह ने करीब पांच साल पहले 2020 में मथुरा जिले की निचली अदालत की शरण में जाकर के भगवान श्रीकृष्ण के मूल जन्म स्थान (गर्भ गृह) पर बनाई गई मस्जिद को हटा करके वहां भव्य मंदिर भगवान श्री कृष्ण का बनवाने की मांग करते हुए प्रार्थना पत्र दिया था। अब यह लड़ाई प्रयागराज हाईकोर्ट में पहुंच गई है।  उनका दावा है कि श्रीकृष्ण जन्मभूमि के जिस भू-भाग पर आज शाही ईदगाह मस्जिद खड़ी है। उसी स्थान पर आज से 5252 वर्ष पूर्व वासुदेव देवकी नंदन श्रीकृष्ण भगवान का प्राकट्य हुआ था। उनके परलोक चले जाने पर श्री कृष्ण के प्रपौत्र राजा वज्रनाभ ने वहां पर एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया था। इसके बाद चंद्रगुप्त विक्रमादित्य  ने हमारे पूर्वज, आराध्य इष्ट, भगवान श्री कृष्ण जी के मंदिर को विशाल आकर दिया।

दुनिया का बड़ा अचंभा था मंदिर

भगवान श्री कृष्ण जी के विग्रह को न धरती छूती थी न अम्बर। किसी दिवाल का भी सहरा नहीं दिया गया था। वे तो हवा में झुलते थे। श्रीकृष्ण की जन्म भूमि को विदेशी आक्रांताओं की नजर लग गई। … अफगानिस्तान की गजनी स्टेट से एक वहशी दरिंदा लुटेरा महमूद आया था। इतिहास में उसको महमूद गजनवी के नाम से जाना गया। उसने मथुरा पर जब आक्रमण किया तो वह भगवान श्रीकृष्ण के मंदिर को देखने के लिए गया। तो वह देखता ही रह गया। तीन दिन तक टकटकी लगाकर मंदिर को निहारने के बाद उस वहशी दरिंदे ने मंदिर को तोड़ने का फरमान जारी कर दिया।

महमूद गजनवी के साथ आए उसके मंत्री … ने बकायदा अपनी ही पुस्तक तारीक ए यामिनी में इसका वर्णन भी किया। महमूद गजनवी कहता था कि ऐसा विशाल अद्भुत आकर्षक मंदिर न उसने देखा और न उसके फरिश्तों ने ही देखा। विधर्मी के सेना ने मंदिर को खंड खंड कर डाला।

21 दिन तक बहाया था हिंदुओं का खून

21 दिन विधर्मी मथुरा वृंदावन में धन दौलत और हिंदुओं की महिलाओं की अस्मत लूटते रहे। वृद्ध, महिला, बच्चे का विधर्मियों ने बेहरमी से कत्ल कर दिया। गली गलियारों में खून पानी की तरह बहने लगा। यमुना नदी का पानी का रंग लाल हो गया। विधर्मी द्वारा मथुरा में किए गए गदर के  संबंध में श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति न्यास एवं श्रीकृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह मस्जिद विवाद के हिंदू पक्षकार महेंद्र प्रताप सिंह एडवोकेट कहते हैं, तीन सौ ऊंट गाड़ियों में गजनवी मथुरा से सोना,  चांदी, हीरेे जवाहरात लाद कर ले गया था। हिंदुओं पर जुल्म और अत्याचार की इस कहानी को वहशी दरिंदे ने यहीं विराम नहीं दिया। दस हजार से अधिक हिंदू महिलाओं को बंदी बनाकर अपने साथ गजनी ले गया। जहां उनको उसने कौड़ियों के भाव बेच दिया।

इस्लामीकरण का जारी किया था फरमान

 महमूद गजनवी ने अपने सैनिकों को आदेश दिया था कि हिन्दुओं का धर्म बदलवाएं और इस्लाम धर्म कबूल भी कराएं। जो इस्लाम धर्म कबूल करने से इंकार करता है तो उसे सरेआम फांसी पर लटकाया जाए। सिर धड़ से अलग कर दिया जाए।

 तड़प- तड़प कर तोड़ा था बच्चों ने दम

विधर्मियों के आतंक से बचने के लिए हिंदू परिवार जंगलों में भाग कर छिप गए थे। इनमें वृद्ध, बुजुर्ग, महिलाएं व बच्चे भी शामिल थे। जंगलों में उनको खाने को नहीं मिला तो भूख से तड़पने लगे। खाद्य समाग्री न मिलने से बच्चों ने अपने मां, पिता, भाई बहन की गोद में दम तोड़ दिया। जो लोग बचे और लौट कर आए उजड़ी हुई वीरान बस्तियां ही मिली थी। एक एक तिनका जोड़कर के घरौंदे बनाए। इस अत्याचारी तूफान ने कान्हा की नगरी को बुरी तरह झकझोर कर रख दिया था।