श्रीकृष्ण जन्मभूमि: लड़ाई अदालत में रहे या सड़क पर? कारसेवा के औचित्य पर सवाल, लेकिन जनजागरण से पीछे हटने का भी कारण नहीं

श्रीकृष्ण जन्मभूमि: लड़ाई अदालत में रहे या सड़क पर?

 

कारसेवा के औचित्य पर सवाल, लेकिन जनजागरण से पीछे हटने का भी कारण नहीं

 

मथुरा

 

श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह विवाद एक बार फिर मथुरा की सीमाओं से बाहर चर्चा का विषय है। हाथरस की जनसभा में दिए गए बयानों के बाद विवाद ने राजनीतिक और सामाजिक विमर्श में नई जगह बनाई है। इसी बीच 18 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर समझौते की तीसरी कोशिश भी मुस्लिम पक्ष की अनुपस्थिति के कारण आगे नहीं बढ़ सकी। विशेष लोक अदालत ने मध्यस्थता से संबंधित पत्रावली निस्तारित कर दी।हिंदू पक्षकार महेंद्र प्रताप सिंह एडवोकेट

यह घटनाक्रम बताता है कि मामला अब केवल एक मुकदमे का विषय नहीं रहा। इसके साथ इतिहास, आस्था, स्वामित्व, न्यायिक प्रक्रिया, समझौता और जनभावना—सभी प्रश्न जुड़ गए हैं। ऐसे समय में यह तय करना और भी जरूरी है कि आंदोलन की दिशा क्या हो और उसकी सीमा क्या हो।

महेंद्र प्रताप सिंह ने बनाया जमीन का सवाल केंद्रीय मुद्दा

हिंदू पक्षकार महेंद्र प्रताप सिंह एडवोकेट ने हाल की समझौता वार्ताओं में विवाद का एक स्पष्ट आधार सामने रखा है—जन्मभूमि की भूमि के बदले दूसरी जगह जमीन क्यों?

उनका कहना है कि जिस करीब ढाई एकड़ भूमि को हिंदू पक्ष भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि मानता है, उसके बदले भारत में कहीं और जमीन स्वीकार करने का प्रश्न ही नहीं है। उनका तर्क है कि यदि विवादित भूमि पर अतिक्रमण हुआ है तो समाधान अतिक्रमण हटाना होना चाहिए, अतिक्रमण के बदले वैकल्पिक भूमि देना नहीं। 18 अगस्त की वार्ता के बाद भी उन्होंने इसी रुख को दोहराया।

यह रुख इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे विवाद का चरित्र ‘जगह के बदले जगह’ से निकलकर ‘दावे की वैधानिकता’ के सवाल पर आ जाता है।

1968 के समझौते को लेकर भी दोनों पक्षों की अलग-अलग व्याख्या है। उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार 12 अक्टूबर 1968 को श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ और शाही मस्जिद ईदगाह प्रबंधन के बीच समझौता हुआ था, जिसमें 13.37 एकड़ परिसर में मंदिर और मस्जिद दोनों के बने रहने की व्यवस्था का उल्लेख है। इसी समझौते की वैधता और अधिकार को लेकर वर्तमान मुकदमों में गंभीर विवाद है।

अर्थात, जिस समझौते को एक पक्ष आधार मानता है, दूसरे पक्ष की ओर से उसी की वैधानिक क्षमता और अधिकार पर प्रश्न उठाया जाता है। फैसला अदालत को करना है।

छह साल से अधिक की कानूनी लड़ाई के बीच जनजागरण

महेंद्र प्रताप सिंह की भूमिका का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि उन्होंने इस विवाद को केवल अदालत की फाइलों तक सीमित नहीं रहने दिया। जनसभाओं, धार्मिक आयोजनों और अभियानों के माध्यम से उन्होंने जन्मभूमि के मुद्दे को जनमानस में लगातार जीवित रखा है।

यहां जनजागरण और कानून हाथ में लेने के बीच अंतर समझना जरूरी है।

लोकतंत्र में किसी ऐतिहासिक या धार्मिक मुद्दे पर जनता को जागरूक करना, सभाएं करना, शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांग रखना और अदालत में अपने अधिकार की लड़ाई लड़ना लोकतांत्रिक अधिकारों के दायरे में आता है। लेकिन न्यायालय का निर्णय आने से पहले किसी विवादित स्थल पर बलपूर्वक पहुंचना, निर्माण या तोड़फोड़ करना अथवा कानून-व्यवस्था को चुनौती देना उसी आंदोलन को कमजोर कर सकता है।

यही कारण है कि महेंद्र प्रताप सिंह के मामले में उनकी कानूनी लड़ाई और जनजागरण को अलग-अलग कसौटियों पर देखा जाना चाहिए। वह स्वयं अधिवक्ता हैं और न्यायालय में इस विवाद को लड़ रहे हैं। इसलिए उनकी ओर से उठाया गया जनमत का प्रश्न अदालत की प्रक्रिया का विकल्प नहीं, बल्कि उसके समानांतर चल रहा जनमत निर्माण है।

कारसेवा पर सवाल इसलिए जरूरी

हाल में श्रीकृष्ण जन्मभूमि के लिए 6 दिसंबर को कारसेवा के आह्वान की खबर सामने आई है। इसके बाद प्रशासन ने सुरक्षा को लेकर सतर्कता बढ़ाई है और मथुरा में केंद्रीय बलों ने फ्लैग मार्च भी किया।

यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब विवाद न्यायालय में विचाराधीन है, तब कारसेवा का औचित्य क्या है?

राम जन्मभूमि आंदोलन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में कारसेवा शब्द का अपना भावनात्मक महत्व है। लेकिन मथुरा का वर्तमान विवाद एक न्यायिक प्रक्रिया से गुजर रहा है। ऐसे में कारसेवा यदि प्रतीकात्मक, शांतिपूर्ण और प्रशासन की अनुमति के भीतर है तो उसे जनभावना की अभिव्यक्ति के रूप में देखा जा सकता है। किंतु यदि इसका अर्थ विवादित परिसर में कानून की प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए प्रवेश, निर्माण, तोड़फोड़ या किसी ढांचे को स्वयं हटाने की कोशिश है, तो उसका औचित्य सवालों के घेरे में आएगा।

कानून का शासन किसी भी धार्मिक आस्था से ऊपर व्यवस्था का मूल आधार है।

दिलचस्प बात यह भी है कि विश्व हिंदू परिषद ने हाल में प्रस्तावित कारसेवा से दूरी बनाते हुए अदालत के निर्णय की प्रतीक्षा करने की बात कही है। संगठन ने अपने कानूनी पक्ष को मजबूत बताते हुए न्यायिक रास्ते को प्राथमिकता देने का रुख अपनाया है।

यह रुख विचारणीय है।

आंदोलन जरूरी, लेकिन आंदोलन की मर्यादा भी जरूरी

क्या इसका अर्थ यह है कि जन्मभूमि के मुद्दे पर जनजागरण बंद हो जाना चाहिए? बिल्कुल नहीं।

किसी मुद्दे पर जनमत बनाना लोकतांत्रिक समाज की स्वाभाविक प्रक्रिया है। यदि कोई पक्ष मानता है कि उसके धार्मिक, ऐतिहासिक अथवा संपत्ति संबंधी अधिकार प्रभावित हुए हैं तो वह शांतिपूर्ण तरीके से समाज के सामने अपना पक्ष रख सकता है। दस्तावेज सामने रख सकता है, शोध कर सकता है, सभाएं कर सकता है और न्यायालय में अपना पक्ष मजबूती से रख सकता है।

महेंद्र प्रताप सिंह की वर्तमान रणनीति का यही पक्ष अधिक प्रभावी दिखाई देता है—जनता के बीच मुद्दा और अदालत में कानूनी लड़ाई।

उनके लिए असली परीक्षा यही है कि जनभावना को न्यायिक प्रक्रिया के साथ कैसे जोड़ा जाए।

इतिहास का फैसला अदालत करेगी, भावना समाज व्यक्त करेगा

हिंदू पक्ष का दावा है कि 1670 में औरंगजेब के शासनकाल में मंदिर को क्षति पहुंचाई गई और विवादित स्थल पर ईदगाह का निर्माण हुआ। दूसरी ओर, मुस्लिम पक्ष 1968 के समझौते और वर्तमान कानूनी अधिकारों को अपने पक्ष में आधार मानता है। इन दावों की अंतिम वैधानिक परिणति अदालत के निर्णय से ही होगी।

इसलिए इतिहास को लेकर चाहे जितनी तीखी बहस हो, अंतिम समाधान कानून की चौखट से ही निकलना चाहिए।

महेंद्र प्रताप सिंह जिस सवाल को लगातार उठा रहे हैं—“अतिक्रमण हटाने के बदले जमीन क्यों?”—उसका उत्तर भी भावनाओं से नहीं, कानून और दस्तावेजों से निकलना चाहिए।

अब आंदोलन की अगली कसौटी

लोक अदालत में समझौते के तीन प्रयासों के बाद फिलहाल वह रास्ता बंद होता दिखाई दे रहा है। अब मामला फिर न्यायिक प्रक्रिया की ओर लौटने की संभावना में है।

ऐसे में हिंदू पक्ष के सामने भी दोहरी जिम्मेदारी है—एक ओर अपने दावे को अदालत में मजबूती से सिद्ध करना और दूसरी ओर जनभावना को शांतिपूर्ण तथा कानूनसम्मत दिशा देना।

श्रीकृष्ण जन्मभूमि का मुद्दा यदि वास्तव में न्याय और अधिकार का प्रश्न है तो उसकी सबसे बड़ी ताकत भी न्याय, प्रमाण और कानून ही होने चाहिए।

कारसेवा से भी बड़ा प्रश्न जनजागरण का है। कारसेवा यदि कानून की सीमा लांघती है तो वह आंदोलन को नैतिक और कानूनी रूप से कठिन स्थिति में डाल सकती है। इसके विपरीत, शांतिपूर्ण जनजागरण, ऐतिहासिक साक्ष्यों का अध्ययन, दस्तावेजों के आधार पर तर्क और न्यायालय में सतत लड़ाई—यह रास्ता लंबा जरूर है, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में अधिक टिकाऊ है।

इस दृष्टि से महेंद्र प्रताप सिंह एडवोकेट के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि जिस आंदोलन को उन्होंने जनभावना का विषय बनाया है, उसकी दिशा कानून के सम्मान से अलग न होने पाए।

और शायद इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण संदेश भी यही है—जन्मभूमि की लड़ाई जनमानस में लड़ी जा सकती है, लेकिन उसके अधिकार का अंतिम निर्णय न्यायालय में ही होना चाहिए।