रसोई का गणित बिगड़ा, सरसों- सोयाबीन तेल ने बढ़ाई चिंता

 

नई दिल्ली। घरेलू बाजार में खाद्य तेलों की कीमतों में फिर उछाल आने से आम लोगों की रसोई का बजट प्रभावित होने लगा है। बीते एक सप्ताह में सरसों, सोयाबीन, पाम और बिनौला तेल के दामों में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है। हालांकि मूंगफली तेल के दाम में कुछ नरमी आने से उपभोक्ताओं को थोड़ी राहत जरूर मिली है।

बाजार विशेषज्ञों के अनुसार इस बार खाद्य तेलों की कीमतों में तेजी का मुख्य कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार नहीं, बल्कि घरेलू आर्थिक परिस्थितियां हैं। डॉलर के मुकाबले रुपये के कमजोर होने से विदेशों से तेल आयात करना महंगा पड़ रहा है। इसके साथ ही सरकार द्वारा कच्चे पाम तेल और सोयाबीन डीगम तेल पर आयात शुल्क बढ़ाने का असर भी सीधे बाजार पर दिखाई दिया है।

मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के सोयाबीन प्लांट मालिकों द्वारा ऊंचे दामों पर खरीद किए जाने से भी बाजार में तेजी बनी हुई है। इसका असर सरसों और सोयाबीन तेल के थोक भाव पर साफ दिखाई दे रहा है।

किसानों को मिल रहे बेहतर दाम

खाद्य तेलों की बढ़ती कीमतों के बीच किसानों के लिए यह स्थिति फायदेमंद मानी जा रही है। बाजार सूत्रों का कहना है कि इस समय सरसों, सोयाबीन और कपास जैसी फसलों के दाम न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से ऊपर चल रहे हैं। कपास नरमा का भाव करीब 9 हजार रुपये प्रति क्विंटल के पार पहुंच गया है, जो MSP से लगभग 10 से 11 प्रतिशत अधिक बताया जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि किसानों को बेहतर कीमत मिलने से अगली फसल में तिलहन की बुआई बढ़ सकती है।

एक सप्ताह में ऐसे बदले दाम

बीते सप्ताह सरसों दाना 175 रुपये प्रति क्विंटल महंगा होकर 7,175 से 7,200 रुपये तक पहुंच गया। सरसों तेल में 500 रुपये प्रति क्विंटल की तेजी आई और इसका भाव 14,850 रुपये तक पहुंच गया।

सोयाबीन दाना 350 रुपये महंगा होकर 7,300 से 7,350 रुपये प्रति क्विंटल पर पहुंच गया, जबकि सोयाबीन दिल्ली तेल 150 रुपये बढ़कर 15,825 रुपये प्रति क्विंटल हो गया।

कच्चा पाम तेल (CPO) में 225 रुपये और पामोलीन तेल में 250 रुपये की तेजी दर्ज की गई। बिनौला तेल भी 400 रुपये महंगा हुआ।

वहीं दूसरी ओर गुजरात में नई फसल की आवक बढ़ने से मूंगफली तिलहन और मूंगफली तेल के दाम में गिरावट देखी गई। मूंगफली तेल 250 रुपये सस्ता होकर 15,500 रुपये प्रति क्विंटल पर पहुंच गया।

सूरजमुखी की खेती घटने पर चिंता

खाद्य तेल बाजार से जुड़े जानकारों ने देश में सूरजमुखी की खेती लगभग समाप्त होने की स्थिति पर भी चिंता जताई है। उनका कहना है कि 90 के दशक में कई राज्यों में बड़े स्तर पर सूरजमुखी की खेती होती थी, लेकिन किसानों को उचित मूल्य नहीं मिलने और सरकारी स्तर पर पर्याप्त प्रोत्साहन न मिलने से इसकी खेती लगातार घटती चली गई।