ब्रज में नतमस्तक हुए तीर्थराज, लोट कर स्वयं को किया था निर्मल — पंडित श्यामानंद जी महाराज

मनोज चौधरी वृंदावन।

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ब्रजभूमि की रज का महात्म्य अनंत है। यहां की रज मात्र धूल नहीं, बल्कि स्वयं भक्ति और मोक्ष का स्वरूप है। पंडित श्यामानंद जी महाराज ने एक प्रसंग बताया कि एक बार जब प्रयागराज में कुंभ का योग आया, तब नंदबाबा और ब्रजवासी यह विचार कर रहे थे कि स्नान करने प्रयाग जाएं या नहीं। तभी एक काला घोड़ा उनके सामने से गुजरा।

संत पंडित श्यामानंद जी महाराज

संत महाराज ने कहा— नंदबाबा को लगा कोई असुर आया है, परंतु वह घोड़ा ब्रज की रज में लोट गया और आश्चर्यजनक रूप से उसका रंग भूरा हो गया। जब नंदबाबा ने पूछा, तो वह घोड़ा दिव्य रूप धारण कर बोला— “मैं तीर्थराज प्रयाग हूं। कुंभ के स्नान से सभी पाप मुझ पर आ जाते हैं। परंतु ब्रज की रज में लोटने से मेरे सारे पाप धुल गए। अब मैं निर्मल होकर लौट रहा हूं।”

इस पर नंदबाबा ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा— “जब ब्रज की रज स्वयं प्रयागराज को पवित्र कर देती है, तो हम वहां जाकर क्या करेंगे?”

पंडित श्यामानंद जी महाराज ने कहा कि यही कारण है कि ब्रज की रज को स्वयं देवता और तीर्थराज भी प्रणाम करते हैं। यहां की धूल में प्रेम, भक्ति और भगवान श्रीकृष्ण का साक्षात् वास है। जो इस रज को माथे से लगाता है, उसके समस्त पाप, कष्ट और दुर्भाग्य स्वतः ही मिट जाते हैं।

“ब्रज की रज में प्रेम का रस और मोक्ष का मार्ग दोनों निहित हैं।” — पंडित श्यामानंद जी महाराज