कर्मी बिगाड़ रहे आकाशवाणी की साख
– बजट होने के बाद भी कयी-कयी माह में होता है भुगतान
-कैजुअलों के भरोसे आकाशवाणी केन्द्रों पर मार्च से भुगतान नहीं
मथुरा। प्रसार भारती की साख को नाकारा किस्म के लोग बिगाड़ रहे हैं। भुगतान की व्यवस्था को इतना लचर कर दिया है कि बजट होने के बाद भी कयी-कयी माह तक भुगतान नहीं मिलता। हर क्षेत्र के विशेषज्ञ वार्ताकार भी अब परेशान होने लगे हैं। कुछ सेक्सन के लोगों का भुगतान तो मार्च से बकाया है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को इसकी शिकायत की गई है।
विदित हो कि मथुरा आकाशवाणी केंद्र पर केवल 3 परमानेंट कर्मचारी-अधिकारी हैं जिन्हें कार्यक्रम निर्माण से लेकर गुणवत्ता नियंत्रण आदि सभी काम देखना है। कार्यक्रम निर्माण, प्रस्तुतीकरण सहित सारा काम करीब 60 कैजुअल एनाउंस -कंपेयरों के भरोसे है। इन्हें भी महीने में अधिकतम 6 ड्यूटी से ज्यादा नहीं मिल सकतीं। कयी लोगों तो एक -दो ड्यूटी ही मिल पाती हैं। इसका पैसा भी कयी-कयी माह बाद दिया जाने लगा है। यहीं हाल विशेषज्ञ वार्ताकारों के भुगतान का है। परमानेंट एम्पलाईज का वेतन महीने की आखिरी तारीख को आ जाता है लेकिन कैजुअल कर्मचारियों का तीन से पांच छह माह तक अटका के रखा जाता है। कैजुअल कंपेयर -एनाउंसरों का भुगतान जान बूझकर देरी से किया जा रहा है। किसान वाणी कार्यक्रम के बजट की समय से मांग नहीं की जाती। बजट आने के बाद भी महीनों घुमा दिया जाता है। इस सेक्सन के लोगों का भुगतान मार्च से बकाया चल रहा है लेकिन कोई सुनने वाला नहीं। कैजुअल कंपेयर दिलीप कुमार यादव ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को इसकी शिकायत की है। 22 जुलाई को आयोग ने 84656 नंबर पर शिकायत रजिस्टर्ड कर आईएनवी मिनिस्ट्री व कृषि मंत्रालय को पत्र भेजा तो वहां से बजट रिलीज हुआ। अब बजट आगरा क्लस्टर हैंड कार्यालय में अटका है।
जब जैसी आवश्यकता है के अनुरूप काम लिया जाता है तो भुगतान भी साथ के साथ होना चाहिए। पहले वार्ताकारों की वार्ता रिकार्ड होने के साथ ही चैक प्रदान कर दिया जाता था। अब तो सब कुछ इन लाइन है। एक क्लिक में भुगतान होना चाहिए और समय से होना चाहिए लेकिन नहीं किया जाता।
आकाशवाणी के मथुरा सहित सभी केन्द्रों के कैजुअल्स के जीवन जीने के अधिकार का हनन किया जा रहा है । श्री यादव ने शुक्रवार को आगरा क्लस्टर हैड मयंक अग्रवाल को व्हाट्सएप पर अपनी पीड़ा मैसेज भेजकर व्यक्त की है।








