छाता में बदल रहे मुद्दे, सियासत की धुरी वही: टाउनशिप और चीनी मिल से 2027 से पहले बढ़ी हलचल

मथुरा। छाता विधानसभा क्षेत्र में विकास से जुड़े नए फैसलों के साथ राजनीतिक हलचल भी तेज हो गई है। मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण (एमवीडीए) की 110वीं बोर्ड बैठक में 117 हेक्टेयर की छाता टाउनशिप के ले-आउट को सैद्धांतिक मंजूरी और 93 गांवों को प्राधिकरण क्षेत्र में शामिल करने के प्रस्ताव पर सहमति ने क्षेत्र के विकास की तस्वीर में नए आयाम जोड़े हैं। वहीं, वर्षों से बंद छाता चीनी मिल को लेकर सरकार के हालिया फैसले से किसानों और रोजगार का मुद्दा फिर चर्चा में है।

वृंदावन स्थित गीता शोध संस्थान एवं रासलीला अकादमी में शुक्रवार को मंडलायुक्त नगेंद्र प्रताप की अध्यक्षता में हुई बैठक में छाता टाउनशिप के ले-आउट को मंजूरी दी गई। दिल्ली-आगरा राष्ट्रीय राजमार्ग के समीप प्रस्तावित इस टाउनशिप में आवासीय और व्यावसायिक भूखंडों के अलावा विद्यालय, महाविद्यालय, अस्पताल, होटल, ग्रुप हाउसिंग, सुपर मार्केट और ईडब्ल्यूएस आवास जैसी सुविधाएं प्रस्तावित हैं। मंडलायुक्त ने योजना में बड़े पार्क विकसित करने के निर्देश दिए।

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बैठक में मथुरा, गोवर्धन और छाता तहसील के 93 गांवों को एमवीडीए की सीमा में शामिल करने के प्रस्ताव पर भी सहमति दी गई। इसे अब शासन को भेजा जाएगा। स्वीकृति मिलने पर इन गांवों में नियोजित विकास और भूमि उपयोग नियंत्रण का दायरा बढ़ेगा।

लेकिन छाता की राजनीति में विकास का यह नया अध्याय पुराने राजनीतिक समीकरणों के बीच खुल रहा है। कई वर्षों से विधानसभा क्षेत्र की राजनीति कैबिनेट मंत्री चौधरी लक्ष्मी नारायण और ठाकुर तेजपाल सिंह के इर्द-गिर्द घूमती रही है। दोनों नेताओं के बीच लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक प्रतिस्पर्धा ने क्षेत्र में एक स्थापित राजनीतिक धुरी बनाई है। इसका एक परिणाम यह भी रहा है कि नए राजनीतिक चेहरों के लिए अपनी अलग जगह बनाना चुनौतीपूर्ण रहा है।

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इसी बीच बंद पड़ी छाता चीनी मिल का मुद्दा भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बना हुआ है। ग्रामीण और किसान लंबे समय से मिल को चालू कराने की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। छाता विधायक चौधरी लक्ष्मी नारायण के पास गन्ना विभाग की जिम्मेदारी होने के कारण इस मुद्दे पर सरकार और मंत्री की भूमिका सीधे चर्चा में रहती है।

हालांकि, सरकार ने हाल ही में बंद छाता चीनी मिल परिसर में ड्यूल मोड एथेनॉल प्लांट लगाने की घोषणा की है। करीब 200 करोड़ रुपये की परियोजना में गन्ने के साथ मक्का और धान से एथेनॉल उत्पादन का प्रस्ताव है। इसके बावजूद स्थानीय स्तर पर यह सवाल बना हुआ है कि इससे बंद चीनी मिल को लेकर ग्रामीणों की मूल मांग किस हद तक पूरी होती है।

हिंदू पक्षकार महेंद्र प्रताप सिंह एडवोकेट

यही वजह है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले छाता में विकास और स्थानीय समस्याओं के मुद्दे एक साथ राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन रहे हैं। एक ओर टाउनशिप, एमवीडीए सीमा विस्तार और प्रस्तावित औद्योगिक निवेश जैसे विकास के मुद्दे हैं, तो दूसरी ओर किसान, रोजगार और चीनी मिल के पुनर्संचालन की मांग है।

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छाता की राजनीति में फिलहाल मुद्दे जरूर बदल रहे हैं, लेकिन राजनीतिक धुरी में बड़ा बदलाव दिखाई नहीं देता। अब देखना यह होगा कि विकास की नई परियोजनाएं और चीनी मिल से जुड़ा फैसला स्थानीय लोगों के बीच किस तरह का राजनीतिक विमर्श तैयार करते हैं और क्या इससे लंबे समय से स्थापित राजनीतिक समीकरणों के बीच नए चेहरों के लिए जगह बनती है।