संत परम्परा से सशक्त होता भारत का सांस्कृतिक आत्मविश्वास

मनोज चौधरी 

 

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के उद्बोधन ने रेखांकित किया—विरासत और विकास का संतुलन ही भविष्य का मार्ग

संत मिलन: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ नाथ जी महाराज और मलूक पीठाधीश्वर संत राजेंद्र दास जी महाराज

भारत की पहचान केवल उसकी भौगोलिक सीमाओं से नहीं, बल्कि उसकी गहरी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परम्पराओं से होती है। जब भी समाज पर संकट आया, तब संतों और महापुरुषों ने अपने विचारों से जनमानस को दिशा दी। महान भक्ति संत जगद्गुरु द्वाराचार्य श्री मलूकदास जी महाराज की जयंती के अवसर पर योगी आदित्यनाथ के उद्बोधन ने इसी शाश्वत परम्परा को नए संदर्भों में प्रस्तुत किया।

 

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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने संबोधन में संत मलूकदास जी महाराज के जीवन और उनके योगदान को स्मरण करते हुए कहा कि मध्यकालीन चुनौतियों के बीच संतों ने समाज को न केवल आध्यात्मिक मार्ग दिखाया, बल्कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और सामाजिक एकता का भी आधार मजबूत किया। प्रयागराज की पावन भूमि से निकली यह चेतना आज भी समाज को प्रेरित कर रही है।

भारत की संत परम्परा की सबसे बड़ी विशेषता उसकी समावेशिता रही है। संत रामानंद से लेकर संत कबीर, संत रैदास और गोस्वामी तुलसीदास तक, सभी ने जाति और वर्ग के भेदभाव से ऊपर उठकर समाज को जोड़ने का कार्य किया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी इस परम्परा का उल्लेख करते हुए कहा कि यही एकता भारत की सबसे बड़ी शक्ति रही है।

धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों की भव्यता भी इस जीवंत परम्परा का प्रमाण है। कुंभ मेला जैसे आयोजनों में उमड़ने वाला जनसैलाब भारत की आस्था और सांस्कृतिक गहराई को दर्शाता है। ब्रजभूमि के तीर्थ स्थल और प्रयागराज की त्रिवेणी आज भी करोड़ों श्रद्धालुओं के जीवन का हिस्सा हैं।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने उद्बोधन में विकास और विरासत के संतुलन पर विशेष बल दिया। काशी विश्वनाथ धाम के पुनर्विकास और अयोध्या राम मंदिर के निर्माण का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि आधुनिकता के साथ परम्परा का संरक्षण संभव है। यह दृष्टिकोण न केवल सांस्कृतिक गौरव को बढ़ाता है, बल्कि पर्यटन और रोजगार के नए अवसर भी सृजित करता है।

संत मलूकदास जी महाराज की शिक्षाएं—करुणा, समरसता और सेवा—आज के समय में भी उतनी ही प्रासंगिक हैं। “अपना सा दुख सबका जाने” का उनका संदेश समाज को मानवीय मूल्यों की ओर प्रेरित करता है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी इसी भावना को आगे बढ़ाने का आह्वान करते हुए कहा कि व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज और राष्ट्र के हित में कार्य करना ही सच्चा धर्म है।

अंततः, यह स्पष्ट है कि भारत की शक्ति उसकी सांस्कृतिक चेतना और संत परम्परा में निहित है। यदि इसी आधार पर विकास की दिशा तय की जाए, तो एक सशक्त, समरस और आत्मविश्वासी भारत का निर्माण संभव है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का यह संदेश न केवल श्रद्धा का प्रतीक है, बल्कि भविष्य के लिए एक सकारात्मक मार्गदर्शन भी है।