मनोज चौधरी, मथुरा
यमुना एक्सप्रेस-वे के 127 माइल स्टोन पर हुआ भीषण सड़क हादसा केवल एक दुर्घटना नहीं था, बल्कि व्यवस्था की असफलता का जीवंत उदाहरण था। इस हादसे में 13 लोगों की जान चली गई और कई परिवार हमेशा के लिए उजड़ गए।

लेकिन इतनी बड़ी त्रासदी के बाद भी हालात जस के तस बने हुए हैं। कोहरे से निपटने के इंतजाम आज भी कागजों और बैठकों तक सीमित नजर आ रहे हैं।
घटनास्थल से लेकर आसपास के मार्गों तक सच्चाई साफ दिखती है। सड़क पर बनी पीली और सफेद पट्टियां लगभग मिट चुकी हैं, लेन की पहचान धुंधली है, रिफ्लेक्टर या तो टूट चुके हैं या दिखाई ही नहीं देते। रोशनी के नाम पर लंबे हिस्से अंधेरे में डूबे रहते हैं। घने कोहरे में यह हालात किसी भी चालक के लिए जानलेवा साबित हो सकते हैं।

यदि केवल वृंदावन को जोड़ने वाली सड़क का ही निरीक्षण कर लिया जाए, तो जिम्मेदार विभागों की लापरवाही की पूरी तस्वीर सामने आ जाएगी। जगह-जगह टूटी लेन मार्किंग, खराब संकेतक और असुरक्षित कट इस बात की गवाही देते हैं कि हादसे से पहले भी चेतावनी के कई संकेत मौजूद थे, लेकिन उन पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया।

हादसे के बाद प्रशासनिक अधिकारी मौके पर पहुंचे, जांच के आदेश हुए और बैठकों में सुरक्षा पर मंथन भी हुआ, लेकिन सवाल यह है कि क्या इन 13 मौतों के बाद भी जमीन पर कुछ बदलेगा? जिन परिवारों ने अपनों को खोया है, उनके लिए यह केवल आंकड़े नहीं, बल्कि जिंदगी भर का दर्द है।
जब तक कोहरे के मौसम को ध्यान में रखते हुए सड़क सुरक्षा के ठोस और स्थायी इंतजाम नहीं किए जाएंगे, तब तक हर सर्दी में ऐसी घटनाएं दोहराती रहेंगी। 13 घरों में पसरा सन्नाटा व्यवस्था से जवाब मांग रहा है, लेकिन जवाबदेही आज भी धुंध में ही गुम नजर आ रही है।








