डीएम सीपी सिंह से लगाई गई गुहार का असर 24 घंटे बाद दिखाई दिया।
स्थाई समाधान की आवश्यकता, ग्रामीणों ने की प्रोजेक्ट
की मांग





मथुरा 5 अगस्त 2025
जलप्लावित गांवों में पानी की तेजी से निकासी कराने के लिए डीएम सीपी सिंह के प्रयासों का असर दिखाई देने लगा है। जलस्तर में कमी आते ही हर तरफ गांव से दूर दूर तक का भूभाग दलदल में बदल गया है। कीचड़ ही कीचड़ के दृश्य उभर आए हैं। किनारे के घरों से टकराकर पोखर का पानी आज भी हिलोरें मार रहा है। मकानों के गिरने का खतरा बरकार है। इन में रहने वाले परिवारों का दिन तो इधर उधर गिरते पड़ते बीत जाता है, पर उन्हें रात बड़ी डरावनी लगती है। वे जिलाधिकारी से समस्या के स्थाई समाधान की मांग भी कर रहे हैं। 
मुकुंदपुर गांव की पोखर के हालत पहले से ही नगर निगम प्रशासन को बता रहे थे कि 20-25 मिनट की मध्यम वर्षा से ही मुख्य रास्तों पर पानी भरने के साथ ही नालियों में वापस होकर घरों में घुस जाएगा। ओवरफ्लो होने पर पोखर के पानी को निकालने के लिए कोई दूसरा रास्ता नहीं मिलेगा। इसलिए घरों में तो पानी का भरना साल दर साल लाजिमी है। इसका स्थाई समाधान हो सकता है, पर नगर निगम इस तरफ ध्यान ही नहीं देता है। न प्रशासन की बाढ़ योजना में शामिल किए जाने वाले गांव में ही गांव मुकुंदपुर का नाम शामिल किया जाता है। ठीक ऐसे ही परिदृश्य ग्राम पंचायत, नगर पंचायत और नगर पालिका क्षेत्र में देखे जा सकते हैं। पंपिंग कर पानी को एक स्थान से दूसरे स्थान पर उड़ेलने के लिए धनराशि खर्च की जा रही है, उतने में बरसाती नाले खोदे जा सकते हैं। बरसाती नालों से अधिकांश गांव जुड़े हुए हैं। यह बात अलग है कि उन पर लोगों ने कब्जे कर रखे हैं। ग्राम प्रधान तो यह कार्य मनरेगा से भी करवा सकते हैं। इसलिए ही योजनाकार अफसरों की नीतियां जलभराव को लेकर लगातार गलत साबित होने लगी है।
डीएम सीपी सिंह को मिली शिकायत के आधार पर की करवाई के अंतर्गत ही नगर निगम के वार्ड 15 क्षेत्र के गांव मुकुंदपुर में एक तालाब से दूसरे तालाब में पानी को उड़लने के लिए ट्रैक्टर एक से बढ़ा कर दो कर दिए गए। मगर, 24 घंटे के बाद जाकर जलस्तर में तो कुछ कमी आई, पर अभी एक दर्ज मकान पानी में खड़े हैं।
ये हैं सवाल
क्या बाढ़ योजना ऐसी ही बनाई गई थी।
हर वर्ष यमुना नदी के दोनों किनारे का आबादी इलाका तो नदी के जलस्तर के उफान का दंश झेल रहा है। मगर, कुछ गांवों की जनता भी ऐसा ही दंड किस बात का झेलना पड़ रहा है।

आप तो जानते हैं कि छाता तहसील क्षेत्र की भूमि का भौगोलिक आकार कटोरानुमा है, जबकि कई गांव ऐसे भी जो निचले हिस्से में बसे हुए हैं। इनका भी उद्धार होना चाहिए या नहीं।
मनोज चौधरी
पत्रकार








