–न बंदरों के आतंक से मुक्ति मिल पाई और न जर्जर मकान हुए ध्वस्त
-दोनों ही मुद्दे नगर निगम बोर्ड की बैठक में उठाए गए थे वर्षों पहले

मनोज चौधरी, मथुरा: मथुरा-वृंदावन में कुछ भी नहीं बदला है। सब कुछ वही की वही है, अगर नहीं रहे तो वह पांच श्रद्धालु, जो मंगलवार शाम विष्णु शर्मा के गिरे दो मंजिला मकान के छज्जे के मलबे की चपेट में आकर मारे गए। ये छज्जा भी बंदरों के दो गुटों के बीच हुए आपसी युद्ध का परिणम बताया गया है। आधा दर्जन श्रद्धालु आज भी अस्पताल में दर्द से कराह हैं। जैसा कि हर घटना के बाद होता है, वैसा ही इस बार भी हुआ। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने घटना पर दुख व्यक्त करते हुए मृतकों के आश्रितों को चार-चार लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने के साथ ही घायलों के निश्शुल्क उपचार की घोषणा की है। प्रशासन भी घटना की जांच कराएगा। असल, मुद्दा तो जर्जर मकानों के ध्वस्तीकरण और बंदरों के उत्पात का है।
चार साल से अफसर क्यों रहे मौन : -ये म़ुद्दा कोई नया नहीं है। वर्ष 2019 में तत्कालीन पार्षद रामदास चतुर्वेदी ने मथुरा-वृंदावन के जर्जर मकानों को ध्वस्त करने का मुद्दा नगर निगम की बोर्ड बैठक में उठाया था। उस समय तत्कालीन नगर आयुक्त रविंद्र मांदड़ ने अलीगढ़ यूनिवर्सिटी की टीम बुलाई। तत्कालीन मेयर डा. मुकेश आर्य बंधु ने टीम के साथ मथुरा-वृंदावन में जर्जर मकानों का निरीक्षण किया। नगर निगम ने नोटिस भी जारी किए। बंदरों के आतंक को समाप्त करने के लिए मथुरा-वृंदावन की जनता ने कई बार प्रदर्शन किए। बंदरों को लेकर दिए ज्ञापन की फाइल भी नगर निगम में अब मोोटी हो गई। पर दोनों ही मुद्दों पर किसी ने गंभीरता नहीं दिखाई। परिणाम, सबके सामने हैं। मंगलवार शाम ठाकुर बांके बिहारी मंदिर से करीब दौ मीटर दूर दुसायत मुहल्ला की ओर जाने वाले मार्ग पर स्थित विष्णु शर्मा के दो मंजिला मकान की छत पर बंदर आपस में लड़ गए और छज्जा नीचे गिर गया।
-होती कार्रवाई तो न होता हादसा : नगर निगम बोर्ड की बैठक में जब ये प्रस्ताव पास हो गया था तो फिर जर्जर मकान क्यों न-हीं गिराए गए। अगर, इनको गिरा दिया गया होता तो क्या हादसा होता। आखिर, सर्वे के बाद कार्रवाई को क्यों रोक दिया गया। इसकी जांच होनी चाहिए और जवाबदेही तय कर इस घटना के लिए उनको जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। पर ये असंभव है। रही बात बंदरों की तो उसकी भी योजना तीन साल पहले वेटेरिनरी कालेज में बनाई गई। मंकी सफारी निर्माण का प्रस्ताव शासन को भेजा गया। मगर, न प्रस्ताव पास हुआ न धनराशि मिली।
-अभी टेंडर में उलझा: बंदरों से मुक्ति दिलाने के लिए हाल ही में 15 वित्त आयोग और अवस्थापना निधि की बैठक मेयर विनोद अग्रवाल की अध्यक्षता में हुई। पांच हजार बंदरों को पकड़ने के लिए टेंडर उठाने का दावा भी मेयर विनोद अग्रवाल और नगर आयुक्त अनुनय झा ने किया। मगर, हुआ क्या। वन विभाग से उस स्थान की जानकारी मांगी, जहां इन बंदरों को पकड़ कर छोड़ा जा सके। इससे पहले भी यही जानकारी नगर निगम ने वन विभाग से मांगी थी। मगर, प्रदेश के किसी भी डीएफओ ने अपने यहां बंदरों को छोड़ने की अनुमति नहीं दी। जवाब में कहा, उनके यहां पहले से ही बंदर बहुत है। फलदार वृक्ष नहीं है। इससे बंदरों को खाने के लिए कुछ नहीं मिल पाएगा। वे आसपास की आबादी क्षेत्र में प्रवेश कर जाएंगे। और मानवों पर हमला करेंगे। यहां भी बंदर मानवों पर हमला कर रहे हैं। पूर्व में ऐसी कई घटनाएं सामने आई, जब बंदरों के हमले से बचने के लिए लोग छतों से गिर कर काल के मुंह में समा गए।
-मौत के और भी ठाढ़े महल : ऐसा नहीं है कि वृंदावन में विष्णु शर्मा का अकेला मकान जर्जर हो। अभी और भी मौत के महल यहां ठाढ़े हुए हैं। शहर का चौबिया पाड़ा, जहां आए दिन मकानों में दरार होने की घटनाएं घटित होती रहती है, टीले पर आबादी बसी है। जर्जर मकानों को छोड़कर मालिक चले गए। वे इनमें नहीं रहते हैं, पर आसपास की आबादी के लिए मौत का खतरा छोड़ गए हैं। वृंदावन में भी तमाम जर्जर भवन है। जो पुराने वृंदावन क्षेत्र में हैं। ऐसा नहीं है कि वृंदावन में अफसरों ने गलियों को न देखा हो। कमिश्नर रितु माहेश्वरी तो हाल ही इन क्षेत्रों में भ्रमण करके गई थीं। प्रशासनिक अधिकारी भी आए दिन वृंदावन की स्थिति का जायजा ले रहे हैं। पर क्या उनको ये मौत बनकर ठाढ़े महल दिखाई नहीं दिए?
-इनकी हुई मृत्यु
-गीता कश्यप निवासी जरौली फेस-2 कानपुर
-रश्मि गुप्ता, निवासी जरौली फेस-2 कानुपर
-अंजू मुगई निवासी कृष्णा आर्चिड आेमेक्स वृंदावन
-चंदनराय निवासी भगवानपुर करनाझा देवरिया
-एक अज्ञात








