मनोज चौधरी, आदित्य मंगल : नगरीय निकाय चुनाव में भाजपा और सपा को जो आइना देखने के लिए मिला है, उससे दोनों दलों के बीच जमीं पर काम करने की दौड़ शुरू हो गई है। वर्ष 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव को लेकर आत्ममंथन किया जा रहा है। यूपी में भाजपा वर्ष 2019 के लोक सभा चुनाव में 14 सीट हार गई थी, अब उसका पूरा फोकस उन सीटों पर है। निकाय चुनाव में भाजपा को जिस तरह से लोकसभा क्षेत्र नगीना, बिजनौर, सहारनपुर, अमरोहा और संभल समेत कई कई निकायों में हार का सामना करना पड़ा है, उसको लेकर भाजपा ने अपने मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर समेत अन्य को अभी से दायित्व सौंप दिया है। यहां निकाय चुनाव में भाजपा अपना बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाई है। कई निकाय उसके हाथ से निकल गए। यहां तक कि मथुरा लोक सभा सीट पर भी भाजपा की पकड़ कमजोर हुई है। मथुरा-वृंदावन नगर निगम और कोसीकलां नगर पालिका भाजपा ने अपना कब्जा कर लिया, लेकिन बड़ी संख्या में निर्दलीय पार्षद और सभासदों की जीत ने भाजपा को धरातल पर कमजोर होने का साफ संकेत दे दिया है। वहीं दूसरी तरफ सपा ने निकायों में हार का कारण मतदाता सूची में गडबड़ी बताई है और सपा मुखिया अखिलेश यादव ने बूथ लेवल एजेंट नियुक्त करने को पार्टी नेताओं को निर्देश जारी कर दिए है। सपा बूथ स्तर पर अपने संगठन को पुख्ता करने की कसरत कर रही है, जबक पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आज भी रालोद के बल पर सपा अपने वर्चस्व को स्थापित करने की फिराक में है। रालोद भी पीछे नहीं है। वह भी संगठन को मजबूती करने की कोशिश कर रहा है। बसपा अभी निष्क्रिय नजर आ रही है। उसके कट्टर कार्यकर्ता संगठन के एक फिर से अपने रंग में आने का इंतजार है।








